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Chhattisgarh High Court: सरकारी जमीन से बेदखली पर बांग्लादेशी शरणार्थियों को राहत नहीं, याचिका खारिज

Chhattisgarh High Court ने सरकारी भूमि पर रह रहे कुछ बांग्लादेशी शरणार्थियों द्वारा दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यदि कोई विदेशी सरकारी जमीन पर रहने का कोई वैध कानूनी अधिकार साबित नहीं कर पाता, तो वह उच्च न्यायालय से वहां बने रहने की सुरक्षा की मांग नहीं कर सकता। अदालत ने यह भी कहा कि केवल लंबे समय तक सरकारी जमीन पर रहने या मकान बना लेने से उस भूमि पर स्वामित्व या कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता।

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Chhattisgarh High Court में याचिकाकर्ताओं ने क्या मांग की?

मामला सूरजपुर जिले के ग्राम मदनपुर से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं ने प्रशासन द्वारा जारी बेदखली नोटिस को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय से उनके मकान और दुकानों को तोड़े जाने तथा सरकारी जमीन से हटाने की कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग की थी।

याचिकाकर्ताओं का दावा था कि वे और उनके परिवार वर्ष 1964 में पुनर्वास योजना के तहत तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से आए थे और तब से इस भूमि पर रह रहे हैं। उनका कहना था कि उन्होंने यहां घर बनाए, खेती की, ट्यूबवेल लगाए और उनकी आजीविका इसी भूमि पर निर्भर है।

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सरकारी जमीन पर क्या है विवाद?

याचिका में यह भी कहा गया कि जिस सरकारी भूमि पर वे रह रहे हैं, उसे महात्मा गांधी उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय को उद्यानिकी महाविद्यालय स्थापित करने के लिए आवंटित कर दिया गया, जबकि विश्वविद्यालय ने पहले किसी अन्य स्थान पर भूमि की मांग की थी।

याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि प्रशासन ने उनकी आपत्तियों पर विचार नहीं किया, जबकि परियोजना के लिए अन्य सरकारी भूमि उपलब्ध थी।

दूसरी ओर, राज्य सरकार ने अदालत में कहा कि संबंधित भूमि सरकारी है और इसे एक सार्वजनिक परियोजना के लिए विधिवत आवंटित किया गया है। सरकार ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता भूमि पर अपने स्वामित्व या वैध अधिकार का कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके।

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Chhattisgarh High Court ने याचिका क्यों खारिज की?

न्यायमूर्ति अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने 22 जुलाई के आदेश में कहा कि इस मामले में कई तथ्य विवादित हैं, जिनका निपटारा रिट याचिका के माध्यम से नहीं किया जा सकता।

अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता यह साबित करने वाला कोई वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके कि उन्हें सरकारी भूमि पर रहने का कानूनी अधिकार प्राप्त है।

कोर्ट ने कहा कि किसी विदेशी नागरिक के मौलिक अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 तक सीमित हैं। यदि कोई व्यक्ति नागरिक नहीं है और वह सरकारी भूमि पर वैध अधिकार भी सिद्ध नहीं कर पाता, तो वह अवैध कब्जे की सुरक्षा के लिए रिट क्षेत्राधिकार का लाभ नहीं ले सकता।


सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया गया हवाला

Chhattisgarh High Court ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के दो महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख किया।

पहला, Sarbananda Sonowal v. Union of India, जिसमें विदेशी नागरिकों के अधिकारों से जुड़े सिद्धांतों का उल्लेख किया गया है।

दूसरा, Jagpal Singh v. State of Punjab, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि सरकारी भूमि पर लंबे समय तक कब्जा या निर्माण कर लेने मात्र से किसी व्यक्ति को उस भूमि पर कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता।

उच्च न्यायालय ने कहा कि सरकारी भूमि सार्वजनिक उपयोग के लिए होती है और उस पर अनधिकृत कब्जा कानूनन संरक्षित नहीं किया जा सकता।


इस फैसले का क्या असर होगा?

यह निर्णय सरकारी भूमि पर अनधिकृत कब्जे से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति को सरकारी भूमि पर अधिकार का दावा करने के लिए वैध दस्तावेज और कानूनी आधार प्रस्तुत करना होगा।

हालांकि, यह आदेश विशेष रूप से इस मामले के तथ्यों और प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर दिया गया है।


Chhattisgarh High Court ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि सरकारी भूमि पर लंबे समय तक रहने मात्र से स्वामित्व या कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं होता। अदालत ने याचिकाकर्ताओं की बेदखली रोकने की मांग को अस्वीकार करते हुए कहा कि वैध दस्तावेज के अभाव में सरकारी भूमि पर कब्जे को कानूनी संरक्षण नहीं दिया जा सकता। Chhattisgarh High Court का यह निर्णय सरकारी भूमि से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांतों को दोहराता है।

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