CG High Court Salary Verdict: बरी होने के बाद भी नहीं मिलेगा पूरा पिछला वेतन

CG High Court Salary Verdict में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी को वैध न्यायिक सजा के आधार पर नौकरी से बर्खास्त किया गया था, तो बाद में उच्च अदालत से बरी होने पर भी वह सेवा से बाहर रहने की अवधि का पूरा वेतन अपने अधिकार के रूप में नहीं मांग सकता।

हाई कोर्ट का यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा रहा है।

CG High Court Salary Verdict: क्या है पूरा मामला?

यह मामला छत्तीसगढ़ राज्य बिजली वितरण कंपनी के पूर्व कर्मचारी प्रसाद नायक से जुड़ा है।

जानकारी के अनुसार वर्ष 2012 में एक निचली अदालत ने उन्हें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषी ठहराया था। अदालत की सजा के आधार पर बिजली कंपनी ने अप्रैल 2013 में उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया।

बाद में मामला उच्च न्यायालय पहुंचा और अपील लंबित रहने के दौरान वर्ष 2018 में वे सेवानिवृत्ति की आयु तक पहुंच गए।

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हाई कोर्ट से बरी होने के बाद क्या हुआ?

वर्ष 2020 में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने प्रसाद नायक को उक्त मामले में बरी कर दिया।

इसके बाद बिजली वितरण कंपनी ने वर्ष 2021 में उनका बर्खास्तगी आदेश वापस लेते हुए पेंशन संबंधी लाभ प्रदान कर दिए। हालांकि कंपनी ने अप्रैल 2013 से अगस्त 2018 तक की अवधि का पिछला वेतन और एरियर देने से इनकार कर दिया।

इसी निर्णय को चुनौती देते हुए प्रसाद नायक ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।

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CG High Court Salary Verdict में याचिका क्यों हुई खारिज?

मुख्य न्यायाधीश Ramesh Sinha और न्यायमूर्ति Ravindra Kumar Agrawal की डिवीजन बेंच ने सिंगल बेंच के पूर्व आदेश को बरकरार रखते हुए याचिका खारिज कर दी।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि जिस समय कर्मचारी को सेवा से हटाया गया था, उस समय बर्खास्तगी आदेश एक सक्षम अदालत द्वारा सुनाई गई वैध सजा के आधार पर जारी किया गया था।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बाद में अपील में बरी हो जाना, पूर्व में उत्पन्न सभी कानूनी परिणामों को स्वतः समाप्त नहीं कर देता।

अदालत ने क्या कहा?

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जिस अवधि में कर्मचारी सेवा से बाहर रहा, उस दौरान नियोक्ता और कर्मचारी के बीच सेवा संबंध समाप्त था।

ऐसे में उस अवधि के वेतन को अधिकार के रूप में नहीं मांगा जा सकता।

अदालत के अनुसार केवल इसलिए कि कर्मचारी बाद में बरी हो गया, उसे पूरी अवधि का वेतन देने का दावा स्वतः स्वीकार नहीं किया जा सकता।

‘नो वर्क, नो पे’ सिद्धांत को सही ठहराया

नो वर्क, नो पे का क्या मतलब है?

CG High Court Salary Verdict में अदालत ने ‘नो वर्क, नो पे’ (No Work, No Pay) सिद्धांत को लागू माना।

इस सिद्धांत के अनुसार यदि किसी कर्मचारी ने किसी अवधि में वास्तविक सेवा नहीं दी है, तो वह उस अवधि के वेतन का स्वतः हकदार नहीं माना जाता।

कोर्ट ने कहा कि विवादित अवधि में कर्मचारी ने विभाग में कोई व्यावहारिक सेवा नहीं दी थी, इसलिए पूरे पिछले वेतन की मांग कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं है।

सेवा निरंतरता के सीमित लाभ मिल सकते हैं

अदालत ने यह भी माना कि नियोक्ता द्वारा बर्खास्तगी आदेश वापस लेकर सेवा निरंतरता के सीमित लाभ और पेंशन संबंधी सुविधाएं देना न्यायसंगत है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि कर्मचारी को पूरे अवधि का वेतन और एरियर भी मिल जाए।

सरकारी कर्मचारियों के लिए फैसले का महत्व

CG High Court Salary Verdict का असर भविष्य में ऐसे कई मामलों पर पड़ सकता है, जहां कर्मचारी बाद में अदालत से बरी हो जाते हैं।

यह फैसला स्पष्ट करता है कि बरी होने के बाद सेवा लाभ और वेतन लाभ दो अलग-अलग कानूनी विषय हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत ने इस मामले में सेवा कानून और न्यायिक सिद्धांतों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया है।

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CG High Court Salary Verdict में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वैध न्यायिक सजा के आधार पर बर्खास्त कर्मचारी को बाद में बरी होने पर भी सेवा से बाहर रहने की अवधि का पूरा वेतन अधिकार के रूप में नहीं मिलेगा। अदालत ने ‘नो वर्क, नो पे’ सिद्धांत को लागू मानते हुए याचिका खारिज कर दी। यह फैसला सरकारी कर्मचारियों और सेवा कानून से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।

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