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तीन साल की बच्ची ने त्यागा अन्न-जल और जीवन: संथारा व्रत या धार्मिक अंधविश्वास?

इंदौर से एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है, जहाँ एक तीन साल की बच्ची, विहाना जैन, ने संथारा व्रत के तहत अन्न-जल त्याग कर मृत्यु को प्राप्त किया। इस प्राचीन जैन परंपरा को निभाने वाली वह दुनिया की सबसे कम उम्र की साधिका बनी, जिसके चलते Golden Book of World Records ने भी उसे प्रमाण पत्र जारी किया है।

घटना 21 मार्च की रात इंदौर के एक आश्रम में हुई, जहाँ विहाना ने 9:25 बजे संथारा व्रत लिया और केवल 40 मिनट बाद, 10:05 बजे उसकी मृत्यु हो गई। यह मामला अब पूरे देश में तीखी बहस और विवाद का केंद्र बन चुका है।

विहाना के माता-पिता, पीयूष जैन (35) और वर्षा जैन (32), दोनों IT पेशेवर हैं। उनका कहना है कि उन्होंने यह निर्णय जैन मुनि राजेश मुनि महाराज की सलाह पर लिया। परिवार के अनुसार, विहाना को दिसंबर में ब्रेन ट्यूमर का पता चला था और जनवरी में मुंबई में उसकी सर्जरी हुई थी। हालांकि उसकी हालत कुछ समय के लिए सुधरी, लेकिन मार्च में दोबारा बिगड़ गई।

पीयूष जैन ने कहा, “महाराज जी ने हमें बताया कि अब बेटी का अंत निकट है और उसे संथारा दिलाना चाहिए। यह जैन धर्म में आत्मा की शुद्धि का मार्ग है।” विहाना की माँ ने रोते हुए कहा, “वह कई दिनों से न तो कुछ खा रही थी, न पी रही थी। हमने उसे तड़पते देखा। यह निर्णय बेहद कठिन था, लेकिन हमने उसकी आत्मा की शांति के लिए किया।”

हालाँकि, इस धार्मिक निर्णय ने चिकित्सा विशेषज्ञों और बाल अधिकार कार्यकर्ताओं को चिंतित कर दिया है। मध्यप्रदेश बाल अधिकार आयोग के सदस्य ओंकार सिंह ने कहा, “यह व्रत पूरी तरह से सजग और वयस्क लोगों के लिए है। एक बच्ची सहमति दे ही नहीं सकती। यह बाल संरक्षण कानूनों का उल्लंघन हो सकता है।”

चिकित्सकों ने भी मामले पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। एक वरिष्ठ डॉक्टर ने कहा, “बच्ची को अस्पताल में रहकर पीड़ा कम करने वाला उपचार मिलना चाहिए था। संथारा व्रत एक मानसिक और शारीरिक रूप से कठिन प्रक्रिया है, जिसे एक छोटा बच्चा समझ भी नहीं सकता।”

पूर्व उच्च न्यायालय न्यायाधीश अभय जैन गोहिल ने कहा, “वयस्कों के लिए संथारा वैध है, लेकिन यहाँ एक नाबालिग की बात है। कानूनन कार्रवाई करना मुश्किल हो सकता है, लेकिन नैतिक और कानूनी सवाल ज़रूर उठते हैं।”

इस बीच, Golden Book of World Records द्वारा इसे मान्यता देने पर भी तीखी आलोचना हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बच्चों से जुड़ी गैर-सहमति वाली धार्मिक परंपराओं को बढ़ावा देता है।

मध्यप्रदेश बाल अधिकार आयोग ने इस मामले में कानूनी कार्रवाई की सिफारिश करने की संभावना जताई है। अब देखना होगा कि यह मामला धर्म और कानून के बीच किस दिशा में जाता है।