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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का अहम फैसला: पत्नी की निजता में दखल देना पति का अधिकार नहीं

रायपुर, जुलाई 2025:
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि पति अपनी पत्नी को मोबाइल पासवर्ड, बैंक खाता विवरण, निजी बातचीत या व्यक्तिगत वस्तुएं साझा करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडे की एकल पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा कोई भी दबाव पत्नी की निजता के उल्लंघन के दायरे में आएगा और संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हनन माना जाएगा।


⚖️ कोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने कहा कि:

“किसी महिला को उसके निजी जीवन, डिजिटल डेटा, व्यक्तिगत वस्तुओं और गोपनीय संवाद साझा करने के लिए मजबूर करना, उसकी गोपनीयता के अधिकार (Right to Privacy) का उल्लंघन है।”

इसके अतिरिक्त कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि:

  • पति-पत्नी का रिश्ता आपसी विश्वास पर आधारित होता है, न कि नियंत्रण और मजबूरी पर।
  • किसी भी प्रकार की डिजिटल निगरानी या दबाव (जैसे व्हाट्सएप मैसेज दिखाना, मोबाइल की जासूसी करना आदि) मानवाधिकारों के खिलाफ है।

📲 पासवर्ड और बैंक जानकारी साझा करने का दबाव भी गलत

कोर्ट के अनुसार:

  • पति द्वारा पत्नी से मोबाइल पासवर्ड या बैंक डिटेल साझा करने की मांग करना, निजता का उल्लंघन माना जाएगा।
  • ऐसे कृत्य भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के भी विरुद्ध हैं।

🧑‍⚖️ मामला किस संदर्भ में आया?

यह निर्णय एक वैवाहिक विवाद के संदर्भ में दिया गया, जिसमें पति द्वारा पत्नी से निजी जानकारियां जबरन साझा करवाने की शिकायत की गई थी। पत्नी ने कोर्ट में अपील की कि उसकी निजता का उल्लंघन हो रहा है, जिस पर कोर्ट ने इस मसले को गंभीरता से लिया।


🔍 क्या है निजता का अधिकार?

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में ‘पुट्टास्वामी केस’ में निजता को मौलिक अधिकार घोषित किया था। इस निर्णय के आधार पर हाईकोर्ट ने कहा कि:

“शादीशुदा होने का मतलब यह नहीं कि कोई अपनी निजता खो देता है।”


👩‍⚖️ महिला अधिकार और विवाहिक स्वतंत्रता

  • यह फैसला महिला अधिकारों की रक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • विवाह का अर्थ सहयोग और सम्मान है, न कि जबरदस्ती और निगरानी।
  • इस फैसले से यह भी स्पष्ट होता है कि डिजिटल और व्यक्तिगत स्वतंत्रता विवाह के बाद भी सुरक्षित रहती है।

🗣️ निष्कर्ष

यह फैसला डिजिटल युग में बढ़ती वैवाहिक असहमति, संदेह और साइबर निगरानी की प्रवृत्ति पर करारा प्रहार है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला समाज में महिला अधिकारों, वैवाहिक स्वतंत्रता और निजता की समझ को मजबूत करेगा।