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नोबेल शांति पुरस्कार 2025 पर विवाद: इस्राइल समर्थक बयान को लेकर मारिया कोरीना माचाडो पर उठे सवाल

11 अक्टूबर 2025 Maria Corina Machado Nobel Prize Controversy।
वेनेज़ुएला की लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ता मारिया कोरीना माचाडो को जब नोबेल शांति पुरस्कार 2025 के लिए चुना गया, तो कुछ ही घंटों में सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में विवाद शुरू हो गया। आलोचकों ने उन पर इस्राइल समर्थक रुख अपनाने और गाज़ा में हो रही बमबारी पर चुप्पी साधने के लिए निशाना साधा है।


🎖️ क्यों मिला माचाडो को नोबेल पुरस्कार

नोबेल समिति ने मारिया माचाडो को “लोकतंत्र और मानवाधिकारों की प्रतीक” बताते हुए सम्मानित किया।
समिति के अध्यक्ष योर्गेन वात्ने फ्रिडनेस ने कहा कि माचाडो ने वेनेज़ुएला में तानाशाही शासन के खिलाफ संघर्ष कर यह दिखाया है कि “लोकतंत्र के औजार ही शांति के औजार हैं।”

उन्होंने बताया कि माचाडो को पिछले वर्ष से लगातार धमकियां मिल रही हैं, इसके बावजूद वे देश नहीं छोड़ा। “जब सत्ताधारी ताकतें भय का माहौल बनाती हैं, तब ऐसे साहसी लोगों को पहचानना जरूरी है जो स्वतंत्रता की लौ जलाए रखते हैं,” उन्होंने कहा।


इस्राइल समर्थन पर उठे सवाल

नोबेल घोषणा के बाद, माचाडो के पुराने ट्वीट और बयान फिर से वायरल हो गए हैं, जिनमें उन्होंने इस्राइल और प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी का समर्थन किया था।
उन्होंने एक पोस्ट में लिखा था — “वेनेज़ुएला की लड़ाई, इस्राइल की लड़ाई है।”
एक अन्य बयान में उन्होंने कहा था कि अगर वे सत्ता में आईं, तो वेनेज़ुएला का दूतावास तेल अवीव से यरूशलम स्थानांतरित करेंगी।

इन बयानों के कारण उन्हें गाज़ा नरसंहार का समर्थक बताकर आलोचना की जा रही है।
नॉर्वे के सांसद ब्योर्नार मोक्सनेस ने कहा कि “लिकुड पार्टी ने गाज़ा में जो किया है, उसके साथ सहयोग करने वाली नेता को शांति पुरस्कार देना नोबेल की भावना के खिलाफ है।”


🕌 अमेरिकी मुस्लिम संगठन ने जताया विरोध

काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस (CAIR) ने भी इस फैसले को “नैतिक रूप से अस्वीकार्य” बताया।
संगठन ने कहा कि नोबेल समिति को किसी ऐसे व्यक्ति को सम्मानित करना चाहिए था जो “सभी लोगों के लिए न्याय” की बात करता हो — जैसे गाज़ा में पत्रकार, चिकित्सक या मानवाधिकार कार्यकर्ता जो अपनी जान जोखिम में डालकर सच्चाई सामने लाने का साहस रखते हैं।

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🗳️ विदेशी हस्तक्षेप की मांग पर भी विवाद

माचाडो पर यह आरोप भी है कि उन्होंने 2018 में इज़राइल और अर्जेंटीना को पत्र लिखकर वेनेज़ुएला की सरकार को गिराने में सहयोग मांगा था।
उन्होंने उस पत्र की प्रति सोशल मीडिया पर साझा करते हुए लिखा था —
“मैं प्रधानमंत्री नेतन्याहू और अर्जेंटीना के राष्ट्रपति से अपील करती हूं कि वे अपने प्रभाव का उपयोग कर इस अपराधी शासन को समाप्त करने में मदद करें।”

इस बयान के बाद आलोचकों ने उन्हें “विदेशी हस्तक्षेप की समर्थक” करार दिया था।


🇻🇪 फिर भी बनीं लोकतंत्र की प्रतीक

विवादों के बावजूद, माचाडो अपने देश में लोकतंत्र की लड़ाई का प्रमुख चेहरा बनी हुई हैं। उन्होंने कई बार जेल, धमकियों और नजरबंदी का सामना किया है।
उनके समर्थक मानते हैं कि उन्होंने न केवल तानाशाही के खिलाफ आवाज उठाई, बल्कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए अपनी जान जोखिम में डाली है।