Election Commission को लेकर 24 सितंबर 2026 को एक रिपोर्ट के बाद विवाद तेज हो गया है। The Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के अनुसार, इन आपत्तियों में ऐसे फैसलों और आदेशों का उल्लेख था जिन्हें दोनों आयुक्तों ने अपनी जानकारी या मंजूरी के बिना जारी किए जाने का आरोप लगाया।
रिपोर्ट के मुताबिक, ये आपत्तियां मतदाता सूची, नए मतदाताओं के पंजीकरण, नाम हटाने और चुनावी डेटा तक पहुंच जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों से जुड़ी थीं। एक दिन में चार अलग-अलग आपत्तियां दर्ज किए जाने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है।
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Election Commission में 14 आपत्तियों का मुद्दा
Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, संधू और जोशी ने विशेष रूप से Form 6, मतदाता डेटा तक पहुंच और पश्चिम बंगाल में मतदाता अपीलों से संबंधित प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए।
रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई 2026 में नए मतदाता के Form 6 में पिछले SIR की मतदाता सूची से संबंधित एक सवाल जोड़े जाने पर विवेक जोशी ने पहले ही आपत्ति दर्ज की थी। बाद में संधू ने भी इसे कथित तौर पर “unauthorised and illegal” बताते हुए हटाने की मांग की।
Election Commission और मतदाता डेटा का सवाल
दोनों आयुक्तों की आपत्तियों में चुनावी डेटा के कथित केंद्रीकरण का मुद्दा भी शामिल था। रिपोर्ट के अनुसार, जोशी ने मतदाता डेटाबेस तक पहुंच को लेकर ऑडिट की जरूरत बताई थी, जबकि संधू ने राज्य स्तर के अधिकारियों की पहुंच से जुड़े सवाल उठाए।
पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़े मामलों में भी प्रक्रिया और अपीलों को लेकर सवाल उठाए जाने की बात रिपोर्ट में कही गई है। इसी बीच, चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि पश्चिम बंगाल में SIR के बाद बड़ी संख्या में मतदाताओं से जुड़ी अपीलें लंबित हैं।
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Election Commission और SIR विवाद
SIR यानी Special Intensive Revision मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया है। 2025 में बिहार से शुरू हुई प्रक्रिया को बाद में कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक विस्तार दिया गया। Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय स्तर पर इसके दौरान 13 करोड़ से अधिक नाम ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से हटाए गए।
हालांकि, SIR से जुड़े कई मामलों पर न्यायिक निगरानी भी हुई है। दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट ने हाल में “logical discrepancy” के आधार पर जारी नोटिसों को लेकर चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगा है।
नियुक्ति प्रक्रिया पर पहले भी उठे सवाल
वर्तमान तीन सदस्यीय Election Commission में CEC ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू व विवेक जोशी शामिल हैं। चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट भी इन तीनों को वर्तमान आयोग के सदस्य के रूप में सूचीबद्ध करती है।
संधू मार्च 2024 में चुनाव आयुक्त बने थे, जबकि ज्ञानेश कुमार ने फरवरी 2025 में मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला और विवेक जोशी उसी समय चुनाव आयुक्त बने।
इन नियुक्तियों की प्रक्रिया को लेकर उस समय विपक्ष की ओर से असहमति दर्ज की गई थी। Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में अधीर रंजन चौधरी ने संधू और ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति पर असहमति दर्ज की थी, जबकि 2025 में राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार को CEC बनाए जाने और विवेक जोशी की नियुक्ति के समय अपनी असहमति दर्ज की।
नियुक्ति कानून में क्या बदला?
2023 के कानून के तहत CEC और EC की नियुक्ति के लिए चयन समिति में प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल हैं। इससे पहले चयन प्रक्रिया में भारत के मुख्य न्यायाधीश की भूमिका थी, जिसे नए कानून में बदल दिया गया।
23 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने अलग राय में चयन समिति की संरचना को लेकर “perception test” से जुड़ी चिंता व्यक्त की। उनके अनुसार, सरकार के प्रतिनिधित्व से आयोग की स्वतंत्रता को लेकर जनता में गलत संदेश जाने की आशंका हो सकती है। यह न्यायमूर्ति दत्ता की राय थी, न कि पूरे सुप्रीम कोर्ट का सर्वसम्मत निष्कर्ष।
Election Commission ने क्या कहा?
इस पूरे विवाद में एक महत्वपूर्ण पक्ष चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों का भी है। Hindustan Times के अनुसार, आयोग से जुड़े सूत्रों ने Indian Express की 14 आपत्तियों वाली रिपोर्ट के बाद कहा कि SIR समेत आयोग के सभी फैसलों को तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी प्राप्त थी।
वहीं, आधिकारिक रिकॉर्ड में भी 2026 के दौरान ज्ञानेश कुमार, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी को संयुक्त रूप से आयोग की गतिविधियों में शामिल दिखाया गया है। मई 2026 में तीनों ने ECI के राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लिया था।
इसलिए वर्तमान विवाद का मुख्य सवाल केवल मतभेद होने का नहीं, बल्कि यह है कि संबंधित आपत्तियों की प्रकृति क्या थी, किन फैसलों पर वे दर्ज हुईं और आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया में उनका क्या प्रभाव पड़ा।
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Election Commission से जुड़ी मौजूदा बहस SIR, मतदाता सूची प्रबंधन, आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया और नियुक्ति व्यवस्था जैसे कई संवेदनशील मुद्दों को सामने लाती है। एक तरफ रिपोर्ट में दो चुनाव आयुक्तों की 14 औपचारिक आपत्तियों का विवरण सामने आया है, वहीं आयोग से जुड़े सूत्रों ने फैसलों को सामूहिक मंजूरी मिलने की बात कही है। ऐसे में आगे की न्यायिक कार्यवाही, आधिकारिक स्पष्टीकरण और उपलब्ध रिकॉर्ड इस विवाद की तस्वीर को और स्पष्ट कर सकते हैं।
