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Anup Ranjan Pandey को मिला प्रतिष्ठित सम्मान

Anup Ranjan Pandey को गुरुवार को नई दिल्ली में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया। छत्तीसगढ़ की लोक और आदिवासी कला-संस्कृति को देश-दुनिया तक पहुंचाने वाले पांडेय के लिए यह सम्मान प्रदेश के सांस्कृतिक जगत की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

सम्मान प्राप्त करने के बाद पद्मश्री अनूप रंजन पांडेय ने पुरस्कार को अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं बताया। उन्होंने इसे छत्तीसगढ़ के आदिवासी कलाकारों और प्रदेश की जनता को समर्पित किया।

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Anup Ranjan Pandey ने कलाकारों को समर्पित किया सम्मान

पांडेय ने कहा कि यह सम्मान केवल उनका नहीं है, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोक और आदिवासी कला-संस्कृति से जुड़े हजारों कलाकारों की मेहनत और साधना का सम्मान है।

नई दिल्ली में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति ने देश के अलग-अलग राज्यों से पहुंचे कलाकारों को सम्मानित किया। समारोह में भारतीय लोक, जनजातीय और पारंपरिक कलाओं के संरक्षण की भूमिका को विशेष महत्व दिया गया।

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2,500 लोकगीत-गाथाओं और 175 लोकवाद्यों का संरक्षण

Anup Ranjan Pandey ने छत्तीसगढ़ की लोक परंपराओं को संरक्षित करने के लिए लंबे समय तक काम किया है। उन्होंने प्रदेश के करीब 2,500 लोकगीत, लोकगाथाएं और लोककथाएं जुटाकर उनका संरक्षण किया।

इसके अलावा उन्होंने नाचा के 150 हास्य कार्यक्रमों और 175 लोक वाद्यों को भी संकलित किया। उनका प्रयास छत्तीसगढ़ की उन सांस्कृतिक परंपराओं को सहेजने पर केंद्रित रहा है, जो समय के साथ धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं।

लोकवाद्यों को संग्रहालयों तक पहुंचाया

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद पांडेय ने 80 लोक वाद्य महंत घासीदास संग्रहालय और संस्कृति विभाग को सौंपे। इससे प्रदेश की पारंपरिक संगीत विरासत को संग्रहालय स्तर पर सुरक्षित रखने में मदद मिली।

भोपाल स्थित मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय के लिए उन्होंने देशभर से 200 फूंक से बजाए जाने वाले लोक वाद्य भी जुटाए। इस तरह उनका काम केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देश की व्यापक जनजातीय संगीत परंपरा के संरक्षण तक पहुंचा।

‘बंदूक छोड़ो, ढोल पकड़ो’ से दिया शांति का संदेश

बस्तर की लोककला पर काम करते हुए पांडेय ने आदिवासी कलाकारों के साथ मिलकर करीब डेढ़ दशक पहले ‘बस्तर बैंड’ की शुरुआत की थी। इस बैंड ने बस्तर के पारंपरिक और दुर्लभ लोकवाद्यों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने का काम किया।

Anup Ranjan Pandey का अनूठा सांस्कृतिक अभियान

बस्तर बैंड के माध्यम से ‘बंदूक छोड़ो, ढोल पकड़ो’ अभियान चलाया गया। इसका उद्देश्य युवाओं को रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ना और लोकगीत, लोकसंगीत, लोकगाथा तथा आदिवासी संस्कृति के माध्यम से शांति का संदेश देना था।

अभियान के तहत 100 से अधिक कला मंडलियों को दोबारा सक्रिय किया गया और 5,000 से ज्यादा कलाकारों को इससे जोड़ा गया। बस्तर बैंड से जुड़े 11 कलाकारों को राष्ट्रीय और राज्य स्तर के पुरस्कार भी मिल चुके हैं।

लोककला में पीएचडी और अकादमी से जुड़ाव

पांडेय ने वर्ष 2015 में इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से लोक कला में पीएचडी की। उनकी अकादमिक यात्रा ने लोक कला के अध्ययन और संरक्षण के उनके प्रयासों को नई दिशा दी।

वे करीब 15 वर्षों तक तीन कार्यकाल में संगीत नाटक अकादमी, दिल्ली की जनरल काउंसिल के सदस्य भी रहे। इस दौरान उन्हें देश की पारंपरिक कला और सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े कई महत्वपूर्ण कार्यों से जुड़ने का अवसर मिला।

वर्तमान में वे ‘चिन्हारी रंगमंडल’ के निर्देशक और बस्तर बैंड के संचालक के रूप में सक्रिय हैं। उनकी पत्नी अस्मिता पांडेय और बेटी अनन्या पांडेय भी उनकी सांस्कृतिक यात्रा में सहयोग करती हैं।

राष्ट्रपति ने लोककलाओं के संरक्षण पर दिया जोर

समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने लोक और जनजातीय कलाओं के संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सम्मानित कलाकार भारत का ऐसा सांस्कृतिक मानचित्र सामने रखते हैं, जिसमें देश की मिट्टी की कहानियां, गीत, नृत्य, उत्सव और भाषाओं-बोलियों की परंपराएं शामिल हैं।

राष्ट्रपति ने लोककलाओं के संरक्षण और दस्तावेजीकरण को महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, इन परंपराओं को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए व्यवस्थित प्रयास जरूरी हैं।

संगीत नाटक अकादमी भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय स्तर की प्रमुख कला अकादमियों में से एक है। पुरस्कार और अकादमी से जुड़ी आधिकारिक जानकारी संगीत नाटक अकादमी की वेबसाइट पर देखी जा सकती है।

छत्तीसगढ़ की कला, संस्कृति और पुरातत्व से जुड़ी सरकारी जानकारी छत्तीसगढ़ संस्कृति विभाग पर उपलब्ध है।

Anup Ranjan Pandey को मिला संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार छत्तीसगढ़ की लोक और आदिवासी संस्कृति के लिए गौरव का क्षण है। 2,500 लोकगीत-गाथाओं, 175 लोकवाद्यों और हजारों कलाकारों से जुड़े उनके संरक्षण कार्य ने प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान दी है। ‘बंदूक छोड़ो, ढोल पकड़ो’ जैसे अभियान के जरिए उन्होंने कला को शांति और सकारात्मक बदलाव का माध्यम बनाया। राष्ट्रपति से मिला यह सम्मान उनके साथ-साथ छत्तीसगढ़ के उन तमाम कलाकारों की साधना का सम्मान है, जो अपनी लोक परंपराओं को जीवित रखने में जुटे हैं।

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