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Lakhpati Didi: सुअर पालन से बदली आदिवासी महिला की जिंदगी, अब हर साल 7-8 लाख रुपये की कमाई

Lakhpati Didi की पहचान अब छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले की आदिवासी महिला दिलमती के नाम से जुड़ चुकी है। कभी आर्थिक तंगी से जूझने वाली दिलमती आज सुअर पालन और खेती के दम पर हर साल 7 से 8 लाख रुपये की आय अर्जित कर रही हैं। उनकी सफलता ने न केवल उनके परिवार की तस्वीर बदली है, बल्कि पूरे गांव की महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनने की नई राह दिखाई है।

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Lakhpati Didi दिलमती की सफलता की कहानी

बलरामपुर जिले के आदिवासी बहुल क्षेत्र स्थित लडुवा ग्राम पंचायत की निवासी दिलमती पहले पारंपरिक खेती के भरोसे परिवार का पालन-पोषण करती थीं। खेती से होने वाली सीमित आय के कारण परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी।

हालांकि उन्होंने हार नहीं मानी। सही मार्गदर्शन, स्वयं सहायता समूह और सरकारी योजनाओं का लाभ लेकर उन्होंने अपनी जिंदगी बदल दी। आज लोग उन्हें सम्मान के साथ Lakhpati Didi कहकर बुलाते हैं।


आर्थिक तंगी से आत्मनिर्भरता तक का सफर

दिलमती मां दुर्गा महिला स्व-सहायता समूह (Self Help Group) से जुड़ीं। समूह की नियमित बैठकों में उन्होंने बचत की आदत विकसित की और प्रगतिशील संसाधन व्यक्तियों एवं विभागीय अधिकारियों से स्वरोजगार के विभिन्न विकल्पों की जानकारी प्राप्त की।

इन्हीं बैठकों से प्रेरित होकर उन्होंने सुअर पालन व्यवसाय शुरू करने का निर्णय लिया।

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Lakhpati Didi ने कैसे शुरू किया सुअर पालन?

दिलमती ने एक लाख रुपये का ऋण लेकर झारखंड से 10 सुअर खरीदे। शुरुआती दौर में कई चुनौतियां आईं, लेकिन उन्होंने धैर्य और मेहनत से कारोबार को आगे बढ़ाया।

करीब एक वर्ष बाद उनका व्यवसाय लाभ देने लगा। वर्तमान में उनके पास 9 मादा सुअर हैं, जिनसे हर वर्ष लाखों रुपये की आय हो रही है।


हर छह महीने में होती है हजारों रुपये की कमाई

दिलमती बताती हैं कि एक मादा सुअर एक बार में 9 से 10 बच्चे देती है।

प्रत्येक बच्चे की बिक्री लगभग 5,000 रुपये में होती है। इस तरह हर छह महीने में उन्हें 40 हजार से 50 हजार रुपये तक की आय होती है। यही कारण है कि आज उनका वार्षिक कारोबार लगातार बढ़ रहा है।


सुअर पालन के साथ खेती से भी बढ़ी आय

Lakhpati Didi ने अपनी कमाई को केवल खर्च नहीं किया बल्कि उसे दोबारा निवेश भी किया।

उन्होंने—

  • आधुनिक सुअर शेड का निर्माण कराया।
  • धान और मक्का की थ्रेसिंग मशीन खरीदी।
  • ड्रिप सिंचाई प्रणाली अपनाई।
  • जैविक सब्जियों की खेती शुरू की।

इन सभी गतिविधियों से उनके परिवार की आय के कई स्थायी स्रोत बन गए हैं।


Lakhpati Didi से प्रेरित होकर गांव में बढ़ा स्वरोजगार

दिलमती की सफलता का असर पूरे गांव में दिखाई दे रहा है।

उनसे प्रेरित होकर लडुवा पंचायत के 10 से 15 परिवारों ने भी सुअर पालन शुरू किया है। अब ये परिवार भी अच्छी आमदनी अर्जित कर रहे हैं।

दिलमती का मानना है कि यदि महिलाएं स्वयं सहायता समूहों से जुड़ें, नियमित बचत करें और ऋण का उपयोग आय बढ़ाने वाले कार्यों में करें, तो वे अपने परिवार की आर्थिक स्थिति बदल सकती हैं।

उन्होंने कहा,

“यदि महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त होंगी, तो परिवार और समाज दोनों मजबूत होंगे।”


प्रशासन करेगा ‘गोट क्लस्टर’ की शुरुआत

बलरामपुर कलेक्टर चंदन संजय त्रिपाठी ने दिलमती के प्रयासों की सराहना की है।

उन्होंने बताया कि अब कृषि विभाग के सहयोग से जिले में ‘गोट क्लस्टर’ स्थापित करने की योजना बनाई जा रही है।

इस योजना के तहत महिलाओं को उच्च गुणवत्ता वाली बकरी नस्लें उपलब्ध कराई जाएंगी, जिससे उन्हें अतिरिक्त रोजगार मिलेगा और उनकी आर्थिक स्थिति और मजबूत होगी।

कलेक्टर ने कहा कि प्रशासन अधिक से अधिक महिलाओं को दिलमती के मॉडल से जोड़ने का प्रयास करेगा। साथ ही स्थानीय स्तर पर गुणवत्तापूर्ण दूध उत्पादों की उपलब्धता भी बढ़ाई जाएगी।


महिला सशक्तिकरण की मिसाल बनीं दिलमती

आज Lakhpati Didi केवल एक सफल पशुपालक नहीं, बल्कि महिला सशक्तिकरण की प्रेरक मिसाल बन चुकी हैं।

उनकी सफलता बताती है कि यदि महिलाओं को सही प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और सरकारी योजनाओं का लाभ मिले तो वे अपने परिवार ही नहीं, पूरे समाज के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।


Lakhpati Didi दिलमती की कहानी मेहनत, आत्मविश्वास और सरकारी योजनाओं के प्रभावी उपयोग का उत्कृष्ट उदाहरण है। बलरामपुर की यह सफलता साबित करती है कि स्वरोजगार और महिला स्वयं सहायता समूह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। आज दिलमती की वार्षिक 7 से 8 लाख रुपये की आय न केवल उनके परिवार के लिए नई उम्मीद बनी है, बल्कि अन्य महिलाओं के लिए भी आत्मनिर्भर भारत की प्रेरणा बन गई है।

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