Guru Ghasidas Central University NSS कैंप नमाज़ विवाद: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने प्रोफेसर की FIR रद्द करने की याचिका खारिज की

Guru Ghasidas Central University (बिलासपुर, छत्तीसगढ़) से जुड़े एक अत्यंत संवेदनशील और चर्चित मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक बड़ा और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने उस प्रोफेसर की FIR रद्द करने की याचिका खारिज कर दी है, जिस पर आरोप है कि उसने NSS कैंप में गैर-मुस्लिम छात्रों को नमाज़ पढ़ने के लिए मजबूर किया।

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने 15 अप्रैल को यह फैसला सुनाते हुए FIR, चार्जशीट और ट्रायल कोर्ट के संज्ञान आदेश में दखल देने से स्पष्ट इनकार कर दिया।


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क्या है पूरा मामला?

यह मामला Guru Ghasidas Central University द्वारा मार्च माह में आयोजित एक 7-दिवसीय NSS (राष्ट्रीय सेवा योजना) कैंप से जुड़ा है। कैंप के दौरान ईद-उल-फित्र के अवसर पर मुस्लिम छात्रों को मंच पर नमाज़ अदा करने के लिए कहा गया।

शिकायत के अनुसार, इस दौरान अन्य गैर-मुस्लिम छात्रों को भी बिना उनकी सहमति के नमाज़ में शामिल होने के लिए बाध्य किया गया। यह घटना तब और गंभीर हो गई जब आरोप लगा कि जो छात्र इसका विरोध करते थे, उन्हें प्रमाण पत्र रद्द करने जैसी धमकियाँ दी गईं।


NSS कैंप में क्या हुआ था?

ईद के अवसर पर मंच पर नमाज़

Guru Ghasidas Central University के इस NSS कैंप में ईद-उल-फित्र के मौके पर मुस्लिम छात्रों को मंच पर नमाज़ पढ़ने के लिए कहा गया। इस पर किसी को शायद आपत्ति नहीं होती, लेकिन विवाद तब बढ़ा जब दूसरे धर्मों के छात्रों को भी इसमें शामिल होने के लिए कहा गया।

बिना सहमति भागीदारी का आरोप

शिकायत में कहा गया कि गैर-मुस्लिम छात्रों की सहमति नहीं ली गई और उन्हें दबाव में नमाज़ में शामिल कराया गया। जिन छात्रों ने इसका विरोध किया, उन्हें यह कहकर डराया गया कि उनका NSS प्रमाण पत्र रद्द कर दिया जाएगा।

FIR और चार्जशीट

प्रारंभिक जांच के बाद पुलिस ने FIR दर्ज की और बाद में एक चार्जशीट भी दाखिल की। इसमें Guru Ghasidas Central University के प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर दिलीप झा का नाम भी आरोपियों में शामिल किया गया।


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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने क्यों किया FIR रद्द करने से इनकार?

जांच पूरी, पर्याप्त सामग्री मौजूद

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जांच पूरी हो चुकी है और आरोपी के खिलाफ आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि चार्जशीट से यह स्पष्ट होता है कि जांच में प्रथमदृष्टया (prima facie) ऐसे साक्ष्य मिले हैं जो ट्रायल की आवश्यकता बताते हैं।

कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा:

“चार्जशीट यह दर्शाती है कि जांच में प्रथमदृष्टया ट्रायल की जरूरत वाले साक्ष्य मिले हैं और इस स्तर पर यह कहने का कोई निर्णायक प्रमाण नहीं है कि यह कार्यवाही किसी गुप्त मंशा से शुरू की गई थी।”

🔗 छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की आधिकारिक जानकारी — highcourt.cg.gov.in


Guru Ghasidas Central University के प्रोफेसर का तर्क

दिलीप झा का बचाव पक्ष

आरोपी दिलीप झा ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि उनकी कैंप स्थल पर कोई परिचालन भूमिका (operational role) नहीं थी और वे घटना के दौरान वहाँ मौजूद भी नहीं थे।

उन्होंने दावा किया कि उनका नाम आरोपियों में शामिल करना बेबुनियाद और आपराधिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

Guru Ghasidas Central University में उनकी भूमिका

दिलीप झा Guru Ghasidas Central University में प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर के रूप में कार्यरत थे। उनका तर्क था कि प्रशासनिक पद पर होने से उन्हें कैंप के अंदर हुई घटनाओं के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता।


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राज्य सरकार का पक्ष और कोर्ट की टिप्पणी

राज्य सरकार ने किया याचिका का विरोध

छत्तीसगढ़ राज्य सरकार ने दिलीप झा की याचिका का विरोध करते हुए कहा कि इस मामले में विवादित तथ्यात्मक प्रश्न शामिल हैं जिनकी जांच ट्रायल के दौरान होनी चाहिए।

कोर्ट ने राज्य से सहमति जताई

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के इस तर्क से सहमति जताई। कोर्ट ने कहा कि ऐसे तथ्यात्मक विवादों का निपटारा FIR रद्द करने की याचिका में नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने आगे कहा:

“याचिकाकर्ता का यह तर्क कि वे घटनास्थल पर अनुपस्थित थे या उनकी भूमिका प्रशासनिक थी — इसे ट्रायल के दौरान जिरह और साक्ष्य प्रस्तुति के माध्यम से पूरी तरह से संबोधित किया जा सकता है।”


किन कानूनी नजीरों पर टिका है फैसला?

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में दो महत्वपूर्ण सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला दिया:

State of Haryana v. Bhajan Lal: इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उन सीमित परिस्थितियों को रेखांकित किया जिनमें FIR रद्द की जा सकती है।

Mohammed Wajid v. State of UP: इस नजीर में भी यह सिद्धांत दोहराया गया कि आपराधिक कार्यवाही को रद्द करना केवल असाधारण परिस्थितियों में ही उचित है।

हाईकोर्ट ने माना कि Guru Ghasidas Central University के इस मामले में ऐसी कोई असाधारण परिस्थिति मौजूद नहीं है।


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Guru Ghasidas Central University से जुड़ा यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता, शैक्षणिक संस्थाओं की जिम्मेदारी और छात्रों के अधिकारों जैसे गहरे सवाल उठाता है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करता है कि प्रशासनिक पद पर होने से कोई व्यक्ति किसी घटना की जिम्मेदारी से स्वतः मुक्त नहीं हो जाता।

अब यह मामला Guru Ghasidas Central University के प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर दिलीप झा के खिलाफ ट्रायल कोर्ट में चलेगा, जहाँ सभी तथ्यों, गवाहों और साक्ष्यों की पूरी जांच होगी। Guru Ghasidas Central University और पूरे शिक्षा जगत के लिए यह एक महत्वपूर्ण संदेश है कि धार्मिक संवेदनशीलता और छात्रों की सहमति का पूरा सम्मान होना चाहिए।

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