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माओवादी हिंसा के बीच फंसे आदिवासी: सरकारी अभियान तेज़, पर सबसे ज्यादा कीमत आम लोग चुका रहे हैं

दंतेवाड़ा, 27 सितंबर 2025।
छत्तीसगढ़ और मध्य-पूर्वी भारत के आदिवासी अंचल दशकों से माओवादी हिंसा और सरकारी सुरक्षा बलों के बीच संघर्ष का मैदान बने हुए हैं। माओवादी आंदोलन, जिसे आधिकारिक रूप से वामपंथी उग्रवाद (Left Wing Extremism) कहा जाता है, 1967 में पश्चिम बंगाल से शुरू हुआ था और अब तक हजारों लोगों की जान ले चुका है।

केंद्र सरकार ने पिछले साल मार्च 2026 तक माओवाद को पूरी तरह खत्म करने का लक्ष्य तय किया और इसके लिए “कठोर अभियान” छेड़ा। सुरक्षा बलों ने जनवरी 2024 से अब तक 600 से अधिक माओवादियों को मार गिराने का दावा किया है। वहीं, बस्तर, बीजापुर और सुकमा जैसे जिलों में नए सुरक्षा कैम्प स्थापित किए गए।

लेकिन इस लड़ाई की सबसे बड़ी कीमत आम नागरिक, खासकर आदिवासी समुदाय चुका रहे हैं।


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✦ दो कहानियाँ, दो दर्द

  • पेकराम मेट्टामी (बस्तर) अपने बेटे सुरेश के लिए रोते हैं। सुरेश मात्र 10वीं पास था लेकिन गाँव का सबसे पढ़ा-लिखा युवक था। वह स्कूल और अस्पताल की सुविधा लाने के लिए संघर्ष करता था। जनवरी में माओवादियों ने उसे पुलिस का मुखबिर बताकर मौत के घाट उतार दिया। पिता कहते हैं, “उसने सिर्फ गाँव के बच्चों और बीमारों के लिए आवाज उठाई, और वही उसकी जान ले बैठा।”
  • दूसरी ओर, अरजुन पोटाम (बीजापुर) अपने भाई लच्छू को खो चुके हैं। फरवरी में हुई एक मुठभेड़ में पुलिस ने 8 माओवादियों को मारने का दावा किया, लेकिन परिवार कहता है कि सभी निर्दोष थे। अरजुन बताते हैं, “मेरे भाई के पास कोई हथियार नहीं था। उसने दोनों पक्षों से रिश्ते बनाए रखे लेकिन कभी बंदूक नहीं उठाई।”
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✦ सुरक्षा बल बनाम स्थानीय आक्रोश

पुलिस का दावा है कि हाल के अभियानों में किसी निर्दोष को निशाना नहीं बनाया गया। लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि “माओवादी” और “साधारण नागरिक” की पहचान अक्सर धुंधली कर दी जाती है।

2021 में सुकमा जिले में नए सुरक्षा कैम्प का विरोध कर रहे पाँच ग्रामीणों को गोली मार दी गई थी। पुलिस ने कहा कि भीड़ माओवादियों द्वारा भड़काई गई थी, लेकिन गाँव वालों का दावा है कि वे सिर्फ सड़क रोककर शांतिपूर्ण विरोध कर रहे थे।


✦ आत्मसमर्पण और ‘नया जीवन’ का वादा

सरकार ने District Reserve Guard (DRG) जैसी इकाइयाँ बनाई हैं, जिनमें स्थानीय युवाओं और पूर्व माओवादियों को भर्ती किया जाता है। अधिकारियों का कहना है कि ये दस्ते माओवादियों की रणनीति समझने और उन्हें पकड़ने में मददगार हैं।

लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि यह कदम आदिवासी युवाओं को “तोप का चारा” बना देता है। सुप्रीम कोर्ट पहले ही 2011 में ऐसी ही SPO (स्पेशल पुलिस ऑफिसर) फोर्स को अवैध करार दे चुकी है।

गाँव के एक पूर्व उग्रवादी ज्ञानेश (परिवर्तित नाम) कहते हैं, “मैंने पिछले साल आत्मसमर्पण किया और कुछ हफ्तों में DRG में भर्ती हो गया। अभी तक मुझे कोई ट्रेनिंग नहीं मिली, लेकिन अभियानों में भेज दिया जाता है।”


✦ विकास का वादा और डर

सरकार ने आत्मसमर्पण कराने वाले गाँवों के लिए 1 करोड़ रुपये का विशेष विकास फंड घोषित किया है। साथ ही नई सड़कें, मोबाइल टॉवर और स्कूल बनाने की योजनाएँ भी हैं। लेकिन कई ग्रामीणों को डर है कि इन परियोजनाओं से उनकी जमीन छिन जाएगी और जंगल उजड़ जाएंगे।

युवा आदिवासी आकाश कोरसा कहते हैं, “जंगल ही हमारी जिंदगी है। अगर यह छिन गया तो हमारा अस्तित्व खत्म हो जाएगा। यही डर लोगों को कभी-कभी माओवादियों का समर्थन करने के लिए मजबूर करता है।”


✦ क्या माओवाद मार्च 2026 तक खत्म होगा?

पूर्व पुलिस महानिदेशक आर.के. विज मानते हैं कि कई जिले “माओवादी मुक्त” घोषित हुए हैं, लेकिन छोटे-छोटे गुट अब भी सक्रिय हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि तय समयसीमा में माओवाद पूरी तरह खत्म होना मुश्किल है।

इसी बीच, आदिवासी समुदाय दोनों ओर से हिंसा झेल रहा है। उर्सा नांदे, जिनके पति 2021 की गोलीबारी में मारे गए थे, कहती हैं—
“सरकार ने कभी मदद नहीं की, और अब माओवादी भी साथ छोड़ चुके हैं। हम तो बस बीच में पिस रहे हैं।”