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Supreme Court Section 304: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पर सख्त टिप्पणी

Supreme Court Section 304 मामले में 14 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के एक फैसले पर कड़ी टिप्पणी की। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304 के भाग I और भाग II के बीच अंतर को लेकर हाईकोर्ट के दृष्टिकोण पर सवाल उठाए।

यह मामला एक दोषी की याचिका से जुड़ा है, जिसमें हाईकोर्ट ने हत्या की सजा को बदलकर गैर-इरादतन हत्या से संबंधित धारा 304 Part II के तहत 10 साल के कठोर कारावास में बदल दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले में छत्तीसगढ़ राज्य को नोटिस जारी किया और हाईकोर्ट से स्पष्टीकरण मांगा कि उसके फैसले को रद्द क्यों नहीं किया जाना चाहिए। यह ध्यान रखना जरूरी है कि नोटिस जारी होना अंतिम फैसला नहीं है; मामले पर आगे की सुनवाई और न्यायालय का निर्णय महत्वपूर्ण होगा।

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क्या है पूरा रायमति पटेल हत्याकांड?

अभियोजन पक्ष के अनुसार, रायमति पटेल नाम की एक महिला बांस के पेड़ के नीचे खून से लथपथ हालत में मिली थीं। पूछे जाने पर उन्होंने बताया था कि चिंतामई नाम के आरोपी ने उन पर हमला किया था। बाद में महिला की मौत हो गई।

मृतका के पति ने पुलिस में प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई। जांच पूरी होने के बाद मामला अदालत पहुंचा और आरोपी के खिलाफ IPC की धारा 302 के तहत हत्या का आरोप तय किया गया।

महासमुंद जिले के सरायपाली स्थित प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की अदालत ने आरोपी को हत्या का दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके बाद दोषी ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में अपील दायर की।

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हाईकोर्ट ने क्यों बदली थी सजा?

अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने विचार किया कि क्या यह मामला IPC की धारा 300 के अपवाद 4 के अंतर्गत आता है। यह अपवाद कुछ परिस्थितियों में हत्या के अपराध को गैर-इरादतन मानव वध की श्रेणी में रखने से संबंधित है।

हाईकोर्ट ने Gurmukh Singh v. State of Haryana (2009), State v. Sanjeev Nanda (2012) और Arjun v. State of Chhattisgarh (2017) जैसे फैसलों का उल्लेख किया।

हाईकोर्ट के अनुसार, आरोपी का मृतका की हत्या करने का कोई स्पष्ट मकसद नहीं था और मृत्यु कारित करने का इरादा भी स्थापित नहीं हुआ। हालांकि, अदालत ने माना कि आरोपी को चोट पहुंचाते समय यह जानकारी होनी चाहिए थी कि ऐसी चोटों से मृत्यु होने की संभावना है।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने धारा 302 के तहत दोषसिद्धि को हटाकर धारा 304 Part II के तहत 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई।

Section 304 Part I और Part II में क्या अंतर है?

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का मुख्य केंद्र इन दोनों कानूनी प्रावधानों के बीच का अंतर है।

Section 304 Part I: दोषपूर्ण आशय

धारा 304 Part I उन मामलों में लागू हो सकती है, जहां आरोपी ने ऐसा कृत्य किया हो जिससे मृत्यु हुई और उसके पीछे मृत्यु कारित करने का आशय या ऐसी शारीरिक चोट पहुंचाने का आशय हो, जिससे मृत्यु होने की संभावना हो।

Section 304 Part II: दोषपूर्ण ज्ञान

धारा 304 Part II उन मामलों से संबंधित है, जहां मृत्यु कारित करने का ऐसा आशय मौजूद नहीं होता, लेकिन आरोपी को यह ज्ञान होता है कि उसका कृत्य मृत्यु का कारण बन सकता है।

इसलिए दोनों भागों में अंतर केवल सजा का नहीं, बल्कि आरोपी की मानसिक स्थिति, कृत्य की प्रकृति और उपलब्ध साक्ष्यों के कानूनी मूल्यांकन का भी है। किसी मामले में कौन-सा प्रावधान लागू होगा, यह तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

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सुप्रीम कोर्ट ने किन पहलुओं पर उठाए सवाल?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने मामले में चोटों की प्रकृति, वारदात में इस्तेमाल किए गए हथियार और घटना की शुरुआत से जुड़ी परिस्थितियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।

पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि धारा 304 Part I और Part II के बीच अंतर तय करते समय केवल मकसद की अनुपस्थिति को आधार नहीं बनाया जा सकता। चोटों की गंभीरता, इस्तेमाल किए गए हथियार और आरोपी के आशय या ज्ञान का समग्र आकलन करना आवश्यक है।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इससे पहले 2023 में भी एक फैसले में इन दोनों प्रावधानों के अंतर को विस्तार से समझाया था। वर्तमान मामले में भी अदालत ने इसी कानूनी अंतर के सही इस्तेमाल पर सवाल उठाए हैं।

छत्तीसगढ़ सरकार और हाईकोर्ट से मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ राज्य को नोटिस जारी किया है और हाईकोर्ट से यह बताने को कहा है कि उसके फैसले को क्यों न निरस्त किया जाए।

अब मामले की आगे की सुनवाई में यह स्पष्ट होगा कि हाईकोर्ट के फैसले में कानूनी त्रुटि थी या नहीं और दोषसिद्धि तथा सजा के संबंध में आगे क्या आदेश दिया जाता है। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को अंतिम निर्णय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

Section 304 का सही इस्तेमाल क्यों जरूरी है?

Supreme Court Section 304 मामले ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि हत्या और गैर-इरादतन मानव वध के बीच कानूनी अंतर तय करने के लिए तथ्यों, चोटों की प्रकृति, हथियार और आरोपी की मानसिक स्थिति का सावधानीपूर्वक विश्लेषण जरूरी है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति न्यायिक निर्णयों में कानूनी प्रावधानों के सही अनुप्रयोग के महत्व को रेखांकित करती है। अब अंतिम स्थिति सुप्रीम कोर्ट की आगे की सुनवाई और उसके आदेश से स्पष्ट होगी।

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