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Chhattisgarh High Court: लंबे लिव-इन रिलेशनशिप में शादी से इनकार को हर मामले में रेप नहीं माना जा सकता

Chhattisgarh High Court ने 29 जून को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यदि दो वयस्क लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में साथ रहते हैं, तो कानून यह मानकर चलता है कि उनके बीच बने शारीरिक संबंध आपसी सहमति से थे। ऐसे में बाद में पुरुष द्वारा शादी से इनकार करना स्वतः बलात्कार (रेप) का अपराध नहीं माना जा सकता।

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हर मामला अपने तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर तय किया जाएगा। यदि शुरुआत से ही शादी का झूठा वादा कर महिला की सहमति प्राप्त की गई हो, तो कानूनी स्थिति अलग हो सकती है।


Chhattisgarh High Court ने क्या कहा?

न्यायमूर्ति संजय एस. अग्रवाल और न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की खंडपीठ ने कहा कि लंबे समय तक साथ रहने वाले दो वयस्कों के संबंधों में यह माना जाएगा कि दोनों ने अपने निर्णय और उसके परिणामों को समझते हुए संबंध बनाए।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि केवल यह तथ्य कि दोनों भविष्य में विवाह करना चाहते थे, इससे यह साबित नहीं होता कि शारीरिक संबंध केवल शादी के वादे के कारण ही बनाए गए थे।

पीठ ने यह भी कहा कि आज के समय में महिलाएं आर्थिक रूप से अधिक आत्मनिर्भर हैं। इसलिए ऐसे मामलों में अदालतों को केवल तकनीकी दृष्टिकोण अपनाने के बजाय संबंध की अवधि, दोनों पक्षों के व्यवहार और परिस्थितियों का समग्र मूल्यांकन करना चाहिए।


मामला क्या था?

यह मामला भिलाई नगर निगम में कार्यरत लगभग 40 वर्षीय एक प्रोजेक्ट मैनेजर द्वारा दायर अपील से जुड़ा था।

महिला का आरोप था कि वर्ष 2019 में रायपुर स्थित आईआईएम में एमबीए की पढ़ाई के दौरान उसकी आरोपी से मुलाकात हुई। दोनों के बीच प्रेम संबंध बने और आरोपी ने शादी का भरोसा दिया। इसके बाद दोनों लगभग दो वर्षों तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहे।

महिला के अनुसार, पढ़ाई पूरी होने के बाद आरोपी शादी की बात टालने लगा और बाद में यह कह दिया कि उसके परिवार वाले विवाह के लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि महिला उम्र में बड़ी, तलाकशुदा और ईसाई समुदाय से है।

महिला ने यह भी आरोप लगाया कि नवंबर 2021 में आरोपी ने उसकी इच्छा के विरुद्ध अप्राकृतिक यौन संबंध बनाए। इसके बाद दिसंबर 2022 में भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (बलात्कार) और 377 के तहत एफआईआर दर्ज की गई।

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Chhattisgarh High Court ने किन तथ्यों पर भरोसा किया?

सुनवाई के दौरान Chhattisgarh High Court ने कई महत्वपूर्ण तथ्यों पर विचार किया।

अदालत ने पाया कि जिरह के दौरान महिला ने स्वीकार किया था कि वह महिला आयोग के समक्ष 30 लाख रुपये में समझौते के लिए तैयार थी। रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि आरोपी ने प्रस्तावित समझौते के तहत 15 लाख रुपये का चेक दिया था, लेकिन समझौता नहीं होने पर उसका भुगतान रोक दिया गया।

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि दोनों ने परिवारों की सहमति मिलने पर ही विवाह करने का निर्णय लिया था।

महिला के भाई ने भी गवाही में बताया कि दोनों अलग-अलग समुदायों से होने के बावजूद प्रेम संबंध में थे और इसी कारण उनके बीच शारीरिक संबंध बने।


मेडिकल रिपोर्ट ने भी निभाई अहम भूमिका

फैसले में मेडिकल साक्ष्यों को भी महत्वपूर्ण माना गया।

महिला की जांच करने वाले डॉक्टर ने अदालत को बताया कि मेडिकल परीक्षण के दौरान महिला ने जबरन शारीरिक संबंध या अप्राकृतिक यौन संबंध की शिकायत नहीं की थी। जांच में किसी प्रकार की ऐसी चोट भी नहीं मिली जिससे बलपूर्वक अप्राकृतिक संबंध की पुष्टि हो सके।

इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं हुआ।


फैसले का कानूनी महत्व

Chhattisgarh High Court ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि लंबे समय तक चले लिव-इन रिलेशनशिप को सामान्य परिस्थितियों में सहमति वाला संबंध माना जा सकता है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को बरी करने का निर्णय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पूर्व में स्थापित कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप है। इसलिए आरोपी की बरी होने के खिलाफ महिला की अपील खारिज कर दी गई।

यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों में अदालतों के लिए एक महत्वपूर्ण न्यायिक संदर्भ माना जा सकता है, हालांकि प्रत्येक मामले का निर्णय उसके अपने तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही किया जाएगा।


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Chhattisgarh High Court के इस फैसले ने स्पष्ट किया है कि लंबे समय तक चले लिव-इन रिलेशनशिप में केवल शादी से इनकार कर देने मात्र से हर मामले में बलात्कार का अपराध सिद्ध नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी दोहराया कि ऐसे मामलों में संबंध की अवधि, दोनों पक्षों का आचरण, मेडिकल साक्ष्य और उपलब्ध परिस्थितियों का समग्र मूल्यांकन आवश्यक है। यह निर्णय लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े कानूनी विवादों में महत्वपूर्ण न्यायिक मार्गदर्शन प्रदान करता है।

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