मशरूम उत्पादन से आत्मनिर्भरता का एक ऐसा उदाहरण बिलासपुर से सामने आया है जो हर युवा को सोचने पर मजबूर कर देगा। छत्तीसगढ़ के गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय (GGU) के छात्र-छात्राएं आज किताबों के साथ-साथ मशरूम भी उगा रहे हैं — और उसी कमाई से अपनी सेमेस्टर फीस जमा कर रहे हैं। यह कोई सपना नहीं, बल्कि बिलासपुर के एक कमरे में लटकते मशरूम के बैग्स की असली कहानी है।
मशरूम उत्पादन से आत्मनिर्भरता — GGU की अनोखी पहल
गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर आलोक कुमार चक्रवर्ती की सोच से जन्मी स्वावलंबी छत्तीसगढ़ योजना आज एक जमीनी आंदोलन बन चुकी है। ग्रामीण प्रौद्योगिकी एवं सामाजिक विकास विभाग के छात्र अपनी नियमित पढ़ाई के बाद बचे समय में ऑयस्टर मशरूम की खेती करते हैं। इस पूरे काम की कमान संभाली है सह प्राध्यापक डॉ. दिलीप कुमार ने, जो हर कदम पर विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करते हैं। दरअसल, यह योजना केवल खेती सिखाने की नहीं, बल्कि एक पूरी उद्यमी सोच विकसित करने की कोशिश है। अब तक 40 से 50 विद्यार्थियों की परीक्षा फीस और सेमेस्टर शुल्क मशरूम की बिक्री से भरा जा चुका है।
कैसे होती है खेती — मुस्कान कुमारी की जुबानी
छात्रा मुस्कान कुमारी बताती हैं कि यह प्रक्रिया उतनी मुश्किल नहीं जितनी लगती है। सबसे पहले कच्चे माल को बारीक काटकर उसका कटिया बनाया जाता है और उसे रासायनिक ट्रीटमेंट से गुजारा जाता है। इसके बाद बैगिंग होती है — बैग में मशरूम का फंगस यानी स्पॉन भरा जाता है। फिर इन बैग्स को रस्सियों में एक के ऊपर एक बांधकर हैंगिंग पद्धति से लटका दिया जाता है। कुछ ही दिनों में मशरूम निकलने लगता है।
मुस्कान कहती हैं — “आज सरकारी नौकरी इतनी आसान नहीं। मशरूम जैसा स्वरोजगार भविष्य की असली नींव है। घर बैठे अच्छी आमदनी हो सकती है।”
यह बात सुनकर समझ आता है कि इस पीढ़ी ने इंतजार करना बंद कर दिया है।
20-25 दिन में तैयार — रागिनी कुमारी का अनुभव
छात्रा रागिनी कुमारी के अनुसार ऑयस्टर मशरूम का उत्पादन चक्र सिर्फ 20 से 25 दिनों का होता है। इसलिए यह तेज आमदनी का बेहतरीन जरिया है। हालांकि छात्र केवल कच्चा मशरूम नहीं बेचते, बल्कि उससे कई वैल्यू एडेड उत्पाद भी तैयार करते हैं।
मशरूम से बनने वाले उत्पाद:
इन उत्पादों में मशरूम का अचार, चटनी, पाउडर, ड्राई मशरूम, बड़ी, चकली और सूप शामिल हैं। इन सभी चीजों की बाजार में अच्छी मांग है। रागिनी बताती हैं कि इन्हीं उत्पादों की बिक्री से होने वाली आय से वे अपनी सेमेस्टर फीस जमा कर पाई हैं। यह सुनकर गर्व होता है कि आज का छात्र पढ़ाई का बोझ खुद उठाने में सक्षम हो रहा है।
सिर्फ उत्पादन नहीं — मार्केटिंग भी सीख रहे हैं छात्र
यह पहल केवल मशरूम उत्पादन से आत्मनिर्भरता तक सीमित नहीं है। विद्यार्थी प्रसंस्करण यानी processing और मार्केटिंग भी सीख रहे हैं। इससे उनमें उद्यमिता के वे गुण विकसित हो रहे हैं जो किसी MBA कोर्स में भी मुश्किल से मिलते हैं। इसके अलावा, पढ़ाई पूरी होने के बाद ये युवा नौकरी मांगने के बजाय खुद रोजगार देने की स्थिति में होंगे। जाहिर है, यह अनुभव उनके पूरे करियर की दिशा बदल सकता है।
मशरूम क्यों है खास — सेहत और कमाई दोनों के लिए
मशरूम सिर्फ एक फसल नहीं, यह एक सुपरफूड है। यह प्रोटीन और पोषक तत्वों से भरपूर होता है। इसके नियमित सेवन से हाई बीपी और शुगर जैसी बीमारियों को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। इसी कड़ी में, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और कुपोषण से बचाव होता है।
इसलिए GGU के छात्रों की यह पहल दोहरा फायदा दे रही है — एक तरफ उनकी खुद की आमदनी, दूसरी तरफ समाज को ताजा और पौष्टिक भोजन।
🔗 [ https://icar.org.in — भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, मशरूम उत्पादन गाइड]
गर्मियों में पैरा और मिल्की मशरूम भी
डॉ. दिलीप कुमार बताते हैं कि फिलहाल ऑयस्टर मशरूम का उत्पादन हो रहा है। हालांकि गर्मियों के मौसम में पैरा मशरूम और मिल्की मशरूम की खेती भी की जाती है। यानी यह काम साल भर चलता रहता है और छात्रों की आमदनी भी लगातार बनी रहती है।
निष्कर्ष — एक पीढ़ी जो खुद लिख रही है अपनी कहानी
मशरूम उत्पादन से आत्मनिर्भरता का यह मॉडल पूरे देश के विश्वविद्यालयों के लिए एक मिसाल है। बिलासपुर के ये छात्र साबित कर रहे हैं कि अगर इरादा पक्का हो तो खेत से फीस तक का सफर मुमकिन है। GGU की यह पहल आने वाले समय में हजारों युवाओं को स्वरोजगार की राह दिखा सकती है। सवाल यह है — क्या देश के बाकी विश्वविद्यालय भी इस सोच को अपनाएंगे?
