Gaganyaan Mission को लेकर भारत की तैयारियां अब निर्णायक चरण में पहुंच रही हैं। अक्टूबर में देश के पहले मानव अंतरिक्ष मिशन को शुरू करने की योजना है। यह जानकारी ह्यूमन स्पेस फ्लाइट सेंटर, इसरो के डिप्टी डायरेक्टर राजेंद्र सिंह पी. ब्याली ने एनआईटी के एक कार्यक्रम के दौरान दी।
भारत का यह मिशन केवल अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी की कक्षा तक पहुंचाने तक सीमित नहीं है। इसमें लॉन्च व्हीकल, क्रू मॉड्यूल, पैराशूट, कम्युनिकेशन और समुद्र में सुरक्षित रिकवरी जैसी कई जटिल प्रणालियों का एक साथ सफल संचालन जरूरी होगा।
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Gaganyaan Mission से पहले होंगे तीन मानवरहित मिशन
मानव मिशन से पहले G1, G2 और G3 तीन मानवरहित मिशन किए जाने की योजना है। इन मिशनों के जरिए अलग-अलग प्रणालियों की विश्वसनीयता और सुरक्षा को परखा जाएगा।
करीब 600 टन के ईंधन से भरे लॉन्च व्हीकल के ऊपर अंतरिक्ष यात्रियों को भेजना बेहद चुनौतीपूर्ण काम है। इसलिए किसी आपात स्थिति में क्रू मॉड्यूल को रॉकेट से तुरंत अलग कर सुरक्षित दूरी तक ले जाने वाली व्यवस्था तैयार की जा रही है।
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Gaganyaan Mission में आपात सुरक्षा व्यवस्था
यदि लॉन्च पैड पर किसी गंभीर दुर्घटना की स्थिति बनती है, तो क्रू एस्केप सिस्टम अंतरिक्ष यात्रियों वाले मॉड्यूल को रॉकेट से अलग करके सुरक्षित क्षेत्र तक पहुंचाने में मदद करेगा।
अंतरिक्ष यात्री हर समय भारत के संपर्क क्षेत्र में नहीं रहेंगे। ऐसे में मिशन के दौरान लगातार संपर्क बनाए रखने के लिए अलग-अलग देशों और अंतरिक्ष एजेंसियों के नेटवर्क की मदद लेने की व्यवस्था की जा रही है।
अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती
Gaganyaan Mission में अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा के लिए रॉकेट से लेकर क्रू मॉड्यूल, पैराशूट, संचार और रिकवरी सिस्टम तक हर स्तर पर परीक्षण किया जा रहा है।
क्रू मॉड्यूल के समुद्र में उतरने के बाद उसकी तेज रिकवरी भी महत्वपूर्ण होगी। जानकारी के अनुसार लैंडिंग के करीब 15 घंटे के भीतर रिकवरी जरूरी है। इसके बाद बैटरी, कम्युनिकेशन, GPS और अन्य प्रणालियां प्रभावित हो सकती हैं।
इसलिए समुद्र में लैंडिंग के बाद रिकवरी टीम को तेजी से काम करना होगा। मिशन की सफलता में केवल अंतरिक्ष तक पहुंचना ही नहीं, बल्कि अंतरिक्ष यात्रियों को सुरक्षित वापस लाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
माइक्रोग्रैविटी से शरीर पर क्या असर पड़ेगा?
Gaganyaan Mission और मानव शरीर की चुनौती
अंतरिक्ष में माइक्रोग्रैविटी मानव शरीर के लिए बड़ी चुनौती होती है। पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण के कारण शरीर एक निश्चित संरचना और लंबाई में रहता है।
अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव बहुत कम होने से रीढ़ और हड्डियों की संरचना पर असर पड़ सकता है। ब्याली के अनुसार, करीब 20 दिनों में अंतरिक्ष यात्री की लंबाई लगभग एक इंच तक बढ़ सकती है।
अंतरिक्ष यात्री शुभांशु ने अंतरिक्ष के वातावरण को करीब से महसूस किया है और वहां के सिस्टम से जुड़ी व्यावहारिक जानकारियां साझा की हैं। इन अनुभवों से भारत के मानव अंतरिक्ष मिशन के प्रशिक्षण और तैयारियों को उपयोगी जानकारी मिल सकती है।
भारत के स्पेस स्टेशन से मिलेंगे नए अवसर
भारत के भविष्य के स्पेस स्टेशन से माइक्रोग्रैविटी में वैज्ञानिक प्रयोगों के नए अवसर खुल सकते हैं। यहां मेडिसिन, पौधों की वृद्धि और विभिन्न वैज्ञानिक प्रक्रियाओं पर शोध किया जा सकेगा।
माइक्रोग्रैविटी में पौधों की वृद्धि पृथ्वी की तुलना में अलग होती है। कुछ फसलों की अंतरिक्ष में वृद्धि को लेकर शोध किया जा रहा है, जिनके बारे में संभावना है कि उनकी विकास अवधि पृथ्वी की तुलना में कम हो सकती है।
अंतरिक्ष में भोजन और दवाओं पर रिसर्च
लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहने के लिए भोजन की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती होगी। इसलिए ऐसी फसलों और उत्पादन प्रणालियों पर शोध महत्वपूर्ण होगा, जिन्हें सीमित संसाधनों में अंतरिक्ष वातावरण में विकसित किया जा सके।
इसके अलावा दवाओं के निर्माण और माइक्रोग्रैविटी में उनके व्यवहार का अध्ययन भी भविष्य के मानव अंतरिक्ष अभियानों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
भारत के लिए ऐतिहासिक कदम
Gaganyaan Mission भारत की मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमता की दिशा में बड़ा कदम है। मिशन से पहले मानवरहित परीक्षण, क्रू सुरक्षा, कम्युनिकेशन और रिकवरी सिस्टम पर लगातार काम किया जा रहा है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के आधिकारिक मिशन अपडेट और गगनयान से जुड़ी जानकारी ISRO की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध है।
भारत सरकार के अंतरिक्ष विभाग से जुड़ी नीतियों और कार्यक्रमों की जानकारी Department of Space पर भी देखी जा सकती है।
Gaganyaan Mission भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को नई ऊंचाई देने वाला ऐतिहासिक मिशन बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। अक्टूबर में प्रस्तावित शुरुआत से पहले G1, G2 और G3 मानवरहित मिशनों के जरिए सुरक्षा प्रणालियों को परखा जाएगा। अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षित उड़ान, माइक्रोग्रैविटी में उनके स्वास्थ्य और समुद्र से समय पर रिकवरी जैसी चुनौतियों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इसके सफल होने पर भारत न केवल मानव अंतरिक्ष उड़ान की क्षमता हासिल करेगा, बल्कि भविष्य के स्पेस स्टेशन और अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए भी मजबूत आधार तैयार करेगा।
