Breaking News | देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को सबरीमाला मंदिर केस की सुनवाई के दौरान कई चौंकाने वाले और महत्वपूर्ण बयान सामने आए। केंद्र सरकार ने 9 जजों की संविधान बेंच के सामने भारत के मंदिरों में प्रचलित रीति-रिवाजों का हवाला देते हुए यह स्पष्ट किया कि धार्मिक परंपराओं में बाहरी दखल उचित नहीं है।
यह मामला न केवल सबरीमाला तक सीमित है, बल्कि यह देशभर के धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा जैसे संवेदनशील संवैधानिक प्रश्नों से जुड़ा है।
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🔶 Breaking News: सबरीमाला केस में केंद्र सरकार की बड़ी दलील
Breaking News के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की संविधान बेंच के सामने केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) नटराज ने महत्वपूर्ण दलीलें पेश कीं।
उन्होंने कहा कि भारत के मंदिरों में सदियों से चले आ रहे रीति-रिवाज और परंपराएं उस संप्रदाय विशेष की आस्था और धार्मिक पहचान का हिस्सा हैं।
🔹 मांसाहारी भोजन वाला उदाहरण
ASG नटराज ने एक बेहद स्पष्ट उदाहरण दिया। उन्होंने कहा —
“कई मंदिरों में शाकाहारी भोजन परोसा जाता है। अगर कोई व्यक्ति अपनी पसंद पर कहे कि वह मांसाहारी भोजन करना चाहता है, तो वह किसी खास संप्रदाय के पास जाकर यह नहीं कह सकता कि मुझे यही परोसा जाए।”
उन्होंने आगे कहा कि उस व्यक्ति को अन्य श्रद्धालुओं के अधिकारों में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है। यह दलील व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामूहिक धार्मिक अधिकारों के बीच संतुलन की बात करती है।
🔶 ASG नटराज का चौंकाने वाला बयान – मंदिरों में मदिरा प्रसाद
Breaking News में सबसे ज्यादा चर्चित ASG नटराज का वह बयान रहा जिसमें उन्होंने दक्षिण भारतीय मंदिरों की एक खास परंपरा का जिक्र किया।
उन्होंने कहा कि “दक्षिण भारत के कई मंदिरों में प्रसाद के रूप में मदिरा (शराब) दी जाती है।” उन्होंने यह भी कहा कि “कल को आप इस पर यह आपत्ति नहीं उठा सकते कि मदिरा न दी जाए।”
🔹 इस बयान का क्या है संदर्भ?
यह बयान इस बात को रेखांकित करता है कि हर धार्मिक परंपरा अपने आप में एक अलग संस्कृति है।
कोई बाहरी व्यक्ति — चाहे उसकी नीयत कितनी भी अच्छी हो — किसी संप्रदाय की सदियों पुरानी परंपराओं को अपनी व्यक्तिगत आस्था या सुविधा के आधार पर बदलने की मांग नहीं कर सकता।
यह दलील सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े संवैधानिक प्रश्न के संदर्भ में दी गई है।
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🔶 Breaking News: 9 जजों की संविधान बेंच – 50+ याचिकाओं पर सुनवाई
यह Breaking News इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है।
यह सुप्रीम कोर्ट की सबसे बड़ी बेंचों में से एक है। इसका गठन इसलिए किया गया क्योंकि यह मामला सिर्फ एक मंदिर तक सीमित नहीं है — यह पूरे देश के धार्मिक स्थलों और संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 (धार्मिक स्वतंत्रता) से जुड़ा है।
🔹 कितनी याचिकाएं हैं?
कोर्ट में 50 से अधिक रिव्यू पिटीशन दाखिल हैं। यह याचिकाएं उन लोगों ने दायर की हैं जो 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती दे रहे हैं।
इसके अलावा इस मामले में विभिन्न धर्मों में प्रचलित धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और दायरे पर भी विचार किया जा रहा है।
🔶 2018 का फैसला और उसके बाद की स्थिति
Breaking News के इस पहलू को समझने के लिए 2018 के उस ऐतिहासिक फैसले को जानना जरूरी है जिसने पूरे देश में बहस छेड़ दी थी।
2018 में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत से फैसला दिया था कि सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश का अधिकार है।
🔹 2018 के फैसले के बाद क्या हुआ?
इस फैसले के बाद केरल में बड़ा विवाद खड़ा हो गया। हजारों श्रद्धालुओं ने इस फैसले का विरोध किया।
कई महिलाओं ने मंदिर में प्रवेश का प्रयास किया, लेकिन उन्हें रोका गया। बाद में 50 से अधिक पुनर्विचार याचिकाएं दायर हुईं जो अब 9 जजों की बेंच के सामने हैं।
यह मामला पिछले 26 साल से देश की अदालतों में चल रहा है।
🔶 Breaking News: सुनवाई का पूरा शेड्यूल – 7 से 22 अप्रैल 2026
Breaking News के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान बेंच ने इस मामले की सुनवाई के लिए एक विस्तृत शेड्यूल तय किया है।
| तारीख | सुनवाई का विवरण |
|---|---|
| 7 अप्रैल – 9 अप्रैल 2026 | रिव्यू पिटीशनर्स और समर्थकों की दलीलें |
| 14 अप्रैल – 16 अप्रैल 2026 | विरोध करने वाले पक्षों की दलीलें |
| 7 अप्रैल – 22 अप्रैल 2026 | सुनवाई की कुल अवधि |
यह सुनवाई लगातार तीसरे दिन भी जारी रही। कोर्ट इस दौरान 50 से अधिक याचिकाओं पर विचार करेगी।
🔹 कोर्ट के सामने मुख्य प्रश्न
इस ऐतिहासिक सुनवाई में जिन संवैधानिक प्रश्नों पर विचार हो रहा है वे हैं — क्या धर्मनिरपेक्ष अदालतें किसी धार्मिक संस्था की आंतरिक परंपराओं में हस्तक्षेप कर सकती हैं? महिलाओं के समानता के अधिकार और धार्मिक संप्रदाय की स्वायत्तता में से किसे प्राथमिकता मिलनी चाहिए?
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🔶 धार्मिक स्वतंत्रता बनाम महिला अधिकार – मुख्य मुद्दे
Breaking News के इस पहलू में यह समझना जरूरी है कि यह मामला दो मौलिक अधिकारों के बीच टकराव का है।
एक तरफ है अनुच्छेद 14 और 15 — जो महिलाओं को समानता और भेदभाव से मुक्ति का अधिकार देते हैं।
दूसरी तरफ है अनुच्छेद 25 और 26 — जो धार्मिक स्वतंत्रता और संप्रदाय की स्वायत्तता की गारंटी देते हैं।
🔹 यह केवल सबरीमाला का मामला नहीं
सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं है। इसमें मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद प्रवेश, पारसी महिलाओं के अग्यारी में प्रवेश और अन्य धर्मों में महिलाओं से संबंधित मामले भी शामिल हैं।
यह 9 जजों की बेंच का फैसला आने वाले दशकों तक भारत के धार्मिक और संवैधानिक कानून को प्रभावित करेगा।
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✅ Breaking News: सबरीमाला केस का फैसला बदलेगा देश की धार्मिक तस्वीर
Breaking News की यह कहानी सिर्फ एक मंदिर की नहीं — यह भारत के संविधान, धर्म और महिला अधिकारों के बीच उस नाजुक संतुलन की कहानी है जिसे 9 जजों की संविधान बेंच अब परिभाषित करने वाली है।
केंद्र सरकार की दलीलें, ASG नटराज के बयान और 50 से अधिक याचिकाओं पर सुनवाई — यह सब मिलकर इस मामले को भारतीय न्यायिक इतिहास का एक निर्णायक अध्याय बना रहे हैं।
22 अप्रैल 2026 तक की सुनवाई के बाद जो भी फैसला आएगा, वह न केवल सबरीमाला, बल्कि देशभर के धार्मिक स्थलों और महिलाओं के अधिकारों के भविष्य को तय करेगा। यह Breaking News आज हर भारतीय के लिए जानना जरूरी है।
