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हसदेव अरण्य में 1,742 हेक्टेयर वन भूमि को कोयला खनन के लिए मंज़ूरी, 6 लाख से अधिक पेड़ों की कटाई की आशंका

रायपुर, 5 अगस्त 2025 — छत्तीसगढ़ के सरगुजा ज़िले में स्थित देश के अंतिम बचे पुराने जंगलों में से एक हसदेव अरण्य एक बार फिर विवादों में है। राज्य सरकार ने केंते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक में कोयला खनन के लिए 1,742 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन की सिफारिश की है, जिससे 6 लाख से अधिक पेड़ काटे जा सकते हैं। यह निर्णय 26 जून को सरगुजा के डिवीजनल फॉरेस्ट ऑफिसर द्वारा साइट निरीक्षण के बाद लिया गया।

यह कदम जहां एक ओर विकास की दिशा में बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इससे जुड़ी पर्यावरणीय और सामाजिक चिंताएं राजनीतिक गर्मी का कारण बन गई हैं।


पर्यावरण समूहों का विरोध

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन और हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति ने इस फैसले की तीव्र आलोचना की है और तत्काल रद्द करने की मांग की है। संगठनों ने याद दिलाया कि 2022 में विधानसभा ने हसदेव क्षेत्र में कोयला खनन रोकने का संकल्प लिया था, जिसकी अवहेलना हो रही है।

वन अधिकार कार्यकर्ता आलोक शुक्ला ने बताया कि प्रस्तावित खनन स्थल चोरनई नदी के कैचमेंट क्षेत्र में आता है और लेमरू एलीफेंट रिज़र्व से सिर्फ़ तीन किलोमीटर दूर है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह क्षेत्र बेहद पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील है और यहां खनन से मानव-हाथी संघर्ष और बढ़ेगा।

उन्होंने कहा कि वाइल्डलाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया ने भी इस क्षेत्र में खनन पर रोक की सिफारिश की थी।


केंद्र और राज्य की भूमिका पर सवाल

एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि यह डायवर्जन कोल ब्लॉक के आवंटन के बाद की प्रक्रिया का हिस्सा है। मई में केंद्र सरकार की एक्सपर्ट अप्रेज़ल कमेटी (EAC) ने केंते एक्सटेंशन परियोजना को पर्यावरणीय अनुमति देने की सिफारिश की थी। यह वन स्वीकृति प्रक्रिया का एक अनिवार्य चरण है।

लेकिन सार्वजनिक सुनवाई में 1,623 लिखित आपत्तियाँ दर्ज की गई थीं, जिनको नज़रअंदाज़ कर EAC द्वारा अनुमोदन दिए जाने का आरोप लग रहा है।


राजनीतिक टकराव: कांग्रेस बनाम भाजपा

पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता भूपेश बघेल ने बीजेपी सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि सरकार ने कॉर्पोरेट हितों, विशेष रूप से अदाणी एंटरप्राइजेज को लाभ पहुंचाने के लिए जंगल नष्ट करने का फैसला लिया है।

बघेल ने कहा, “‘मां के नाम एक पेड़’ अभियान शुरू करने वाली बीजेपी सरकार 99% घने जंगल वाले क्षेत्र में 6 लाख पेड़ कटवाने जा रही है, जबकि **राजस्थान की बिजली ज़रूरतें अभी चालू PEKB खदान से 15 वर्षों तक पूरी की जा सकती हैं।” उन्होंने याद दिलाया कि उनकी सरकार ने इस परियोजना को पर्यावरणीय और वन मंज़ूरी नहीं दी थी

भाजपा प्रवक्ता सचिदानंद उपसने ने पलटवार करते हुए कहा कि बघेल सरकार खुद भ्रष्टाचार और शोषण में लिप्त रही है और अब राजनीतिक नौटंकी कर रही है। उन्होंने कहा, “अगर बीजेपी सरकार ने कुछ गलत किया है, तो अदालत जाइए, न कि सड़कों पर हंगामा करिए।”


निष्कर्ष

हसदेव अरण्य का मामला केवल पर्यावरण का ही नहीं, बल्कि आदिवासी अधिकार, पारिस्थितिकी, और जन भागीदारी से जुड़ा है। इस खनन परियोजना को लेकर आने वाले समय में कानूनी और सामाजिक मोर्चे पर संघर्ष और तेज़ होने की संभावना है।