रायपुर। Veer Narayan Singh Sangrahalaya छत्तीसगढ़ की जनजातीय विरासत, परंपराओं और स्वतंत्रता संग्राम की गौरवगाथा को आधुनिक डिजिटल दुनिया से जोड़ने वाला एक अनोखा सांस्कृतिक स्थल बन चुका है। नवनिर्मित यह संग्रहालय न केवल इतिहास का दस्तावेज है, बल्कि ‘आदि संस्कृति’ के जीवंत अनुभव का केंद्र भी है।
11 जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालयों में से एक
यह संग्रहालय भारत सरकार द्वारा स्थापित किए जा रहे 11 जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालयों में प्रमुख है।
1 नवंबर 2025 को राष्ट्र को समर्पित यह परिसर 9.75 एकड़ क्षेत्र में फैला है और लगभग ₹53.13 करोड़ की लागत से विकसित किया गया है।
यहां स्थापित 650 से अधिक मूर्तियाँ, होलोग्राम, 3डी प्रोजेक्शन, और इंटरएक्टिव एआई-आधारित डिस्प्ले आगंतुकों को इतिहास में जीवंत रूप से प्रवेश करवाते हैं।
जनजातीय विद्रोहों और वीरों की गाथाओं का सजीव चित्रण
इस संग्रहालय में कई महत्वपूर्ण जनजातीय आंदोलनों को विस्तार से दर्शाया गया है—
- हल्बा विद्रोह
- पारलकोट आंदोलन
- भूमकाल क्रांति
- रानी चो-रिस आंदोलन
यहां वीर शहीद वीर नारायण सिंह को विशेष रूप से स्थान दिया गया है, जिन्होंने 1857 के विद्रोह में निर्णायक भूमिका निभाई।
साथ ही झाड़ा सिरहा जैसे अल्पज्ञात नायकों की वीरता भी उजागर की गई है, जिन्होंने 1825 के पारलकोट आंदोलन का नेतृत्व किया था।
14 थीम आधारित गैलरियां: जनजातीय जीवन का सजीव संसार
संग्रहालय में मौजूद 14 थीम आधारित गैलरियां आगंतुकों को जनजातीय जीवन के मूल स्वरूप में ले जाती हैं। इनमें शामिल हैं—
- बस्तर की घोटुल परंपरा
- पारंपरिक शिकार और कृषि
- मत्स्य पालन
- लोक नृत्य और संगीत
- पारंपरिक उपचार पद्धतियाँ
- नवाखानी और उरिदखानी जैसे धार्मिक अनुष्ठान
इतना ही नहीं, मराठा शासनकाल की सुबे व्यवस्था और अंग्रेजी शासन के दौरान की बेगार प्रथा जैसे शोषणकारी ऐतिहासिक प्रसंग भी विस्तार से दर्ज हैं।

परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत संगम
संग्रहालय में डिजिटल अनुभव किसी भी आगंतुक को मंत्रमुग्ध कर देता है।
यहां—
- एआई फोटो बूथ
- डिजिटल स्क्रीन
- होलोग्राम
- इंटरएक्टिव ऑडियो-वीडियो डिस्प्ले
जैसी आधुनिक तकनीकों से इतिहास को बिल्कुल नया रूप मिलता है।
‘आदि संस्कृति’ को विश्व पटल पर ले जाने वाली पहल
जनजातीय विकास विभाग के प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा ने संग्रहालय के महत्व को समझाते हुए कहा—
“यह संग्रहालय केवल एक भवन नहीं, बल्कि ‘आदि संस्कृति’ का जीवंत केंद्र है, जो छत्तीसगढ़ की 43 अनुसूचित जनजातियों की विशिष्ट पहचान को संरक्षित करता है। यहां महिलाओं के स्व-सहायता समूहों को आजीविका के नए अवसर मिले हैं, जिससे महिला सशक्तिकरण को भी बढ़ावा मिल रहा है।”
यह पहल भारत सरकार की ‘आदि संस्कृति परियोजना’ और ‘एआई आधारित भाषा संरक्षण प्लेटफॉर्म—आदि वाणी’ से भी जुड़ी है, जिसके तहत गोंडी, मुंडारी, भीली सहित कई जनजातीय भाषाओं का डिजिटल संरक्षण किया जा रहा है।
