₹66 की दिहाड़ी पर 22 दिन से आंदोलन: रायपुर में मिड-डे मील रसोइयों का संघर्ष, ₹400 से अधिक वेतन की मांग

Chhattisgarh Mid Day Meal Cooks Protest रायपुर।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मिड-डे मील योजना से जुड़ी रसोइयां बीते 22 दिनों से लगातार आंदोलन कर रही हैं। इनमें से लगभग 95 प्रतिशत महिलाएं हैं, जो दूर-दराज के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों से यहां पहुंची हैं। इनकी एक ही मांग है—दैनिक मजदूरी ₹66 से बढ़ाकर ₹400 से अधिक की जाए

यह आंदोलन “छत्तीसगढ़ स्कूल मध्यान्ह भोजन रसोइया संयुक्त संघ” के बैनर तले किया जा रहा है।


महिलाओं की मेहनत, लेकिन खुद भूख के कगार पर

कांकेर जिले से आईं सविता मणिकपुरी (38 वर्ष) की कहानी हजारों रसोइयों की पीड़ा बयान करती है।
वर्ष 2011 से वह एक सरकारी मिडिल स्कूल में भोजन बना रही हैं।

“सरकारें बदलती रहीं, लेकिन हमारी हालत नहीं बदली। ₹66 रोज में कैसे जिंदा रहें?”
— सविता मणिकपुरी

सविता बताती हैं कि उनकी बेटी स्कूल पूरी कर चुकी है, लेकिन कॉलेज भेजने के पैसे नहीं हैं। बेटा कक्षा 11 में पढ़ रहा है।


87 हजार रसोइये, लेकिन सम्मान नहीं

संघ के सचिव मेघराज बघेल के अनुसार, छत्तीसगढ़ में करीब 87,000 मिड-डे मील रसोइये कार्यरत हैं।
29 दिसंबर से वे अनिश्चितकालीन हड़ताल पर हैं, जिससे कई स्कूलों में भोजन व्यवस्था प्रभावित हुई है।

“1995 में ₹15 से शुरू किया था, 30 साल बाद भी ₹66 ही मिल रहा है। हम सिर्फ कलेक्टर दर (लगभग ₹440) चाहते हैं।”
— मेघराज बघेल


दूसरे राज्यों से तुलना ने बढ़ाया दर्द

रसोइयों का कहना है कि अन्य राज्यों में समान काम के लिए कहीं ज्यादा वेतन मिलता है—

  • पुडुचेरी – ₹21,000/माह
  • केरल – ₹12,000/माह
  • लक्षद्वीप – ₹6,000/माह
  • मध्यप्रदेश व हरियाणा – ₹4,000/माह

जबकि छत्तीसगढ़ में केवल ₹2,000 महीना, वह भी साल में सिर्फ 10 महीने

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“हम दूसरे बच्चों को खिलाते हैं, अपने नहीं”

धमतरी जिले की भुवनेश्वरी मरकाम (40 वर्ष) पिछले 15 साल से रसोइया हैं।

“सुबह 9 से शाम 3 बजे तक खाना बनाना, परोसना, बर्तन धोना—सब करते हैं। फिर भी सरकार कहती है हम सिर्फ दो घंटे काम करते हैं।”

उनके परिवार की पूरी आजीविका इसी आय पर निर्भर है।


धुएं में झुलसती सेहत

ग्रामीण इलाकों में गैस सिलेंडर नहीं होने से लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाया जाता है।
इससे आंखों की बीमारी, सांस की दिक्कत और दिल की बीमारियां आम हो गई हैं।

संघ के मीडिया प्रभारी प्रमोद राय बताते हैं—

“बरसात में हालत और खराब हो जाती है। इतने साल सेवा के बाद भी हमें बंधुआ मजदूर जैसा समझा जाता है।”


राजनीतिक समर्थन, लेकिन सरकारी चुप्पी

सोमवार को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज धरना स्थल पहुंचे और रसोइयों की मांगों का समर्थन किया।
हालांकि, राज्य शिक्षा विभाग की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।


आंदोलन जारी रखने का ऐलान

महिला रसोइयों ने साफ कहा है कि जब तक सरकार उनकी मांगों पर ठोस फैसला नहीं लेती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा

यह आंदोलन सिर्फ वेतन का नहीं, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और इंसाफ की लड़ाई बन चुका है।


✍️ निष्कर्ष

Chhattisgarh Mid Day Meal Cooks Protest ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जो महिलाएं लाखों बच्चों को रोज भोजन देती हैं, क्या उन्हें खुद सम्मानजनक जीवन का अधिकार नहीं मिलना चाहिए?