Chhattisgarh Krishi News में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (IGKV), रायपुर में “हरित खाद, नीली-हरी शैवाल एवं जैव उर्वरकों” पर एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ कृषि उत्पादन आयुक्त (APC) श्रीमती शहला निगार ने किया। उन्होंने अधिकारियों और वैज्ञानिकों को संबोधित करते हुए रासायनिक उर्वरकों के विकल्पों को अपनाने पर जोर दिया।
इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य था — आगामी खरीफ सीजन से पहले किसानों को सतत कृषि पद्धतियों की ओर प्रेरित करना और जैविक विकल्पों के प्रति जागरूकता फैलाना।
यह भी पढ़ें: Raipur Police ने किया ₹11 लाख का Ganja Racket Bust — 7 गिरफ्तार, 3 चौंकाने वाले खुलासे
APC शहला निगार ने क्यों कहा — रासायनिक उर्वरक छोड़ो?
कृषि उत्पादन आयुक्त श्रीमती शहला निगार ने प्रशिक्षण कार्यक्रम में स्पष्ट किया कि रासायनिक उर्वरकों की संभावित कमी को देखते हुए वैकल्पिक स्रोतों की ओर जाना अब जरूरी हो गया है।
उन्होंने कहा कि हरित खाद, नीली-हरी शैवाल और जैव उर्वरक जैसे विकल्प फसलों की पोषक आवश्यकताओं का लगभग 50 प्रतिशत तक पूरा कर सकते हैं।
APC ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि अगले 2-3 महीनों में इन तकनीकों के उत्पादन और उपयोग को गांव-गांव तक पहुँचाया जाए — ताकि खरीफ सीजन में किसान इसका लाभ उठा सकें।
📢 Chhattisgarh की ताज़ा Krishi और Breaking News सबसे पहले पाने के लिए हमारा WhatsApp Channel Join करें: 👉 https://whatsapp.com/channel/0029VaOjosfFHWq7ssCngl1j

Chhattisgarh Krishi News — हरित खाद और नीली-हरी शैवाल से 50% पोषण
नीली-हरी शैवाल — धान की खेती का सबसे बड़ा दोस्त
तकनीकी सत्रों में विशेषज्ञ वैज्ञानिकों ने बताया कि नीली-हरी शैवाल (Blue-Green Algae) नाइट्रोजन स्थिरीकरण में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
विशेष रूप से धान की खेती में इसकी उपयोगिता सबसे अधिक है। यह मिट्टी में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन जोड़ती है — जिससे रासायनिक उर्वरकों की जरूरत घट जाती है।
हरित खाद — मिट्टी की संरचना बेहतर करने का कुदरती तरीका
विशेषज्ञों ने बताया कि हरित खाद (Green Manure) से मृदा की संरचना बेहतर होती है और पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है।
यह एक ऐसी कम-लागत पद्धति है, जिसे कोई भी किसान आसानी से अपना सकता है। मिट्टी की जल-धारण क्षमता बढ़ती है और दीर्घकालिक उर्वरता सुनिश्चित होती है।
समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन — भविष्य की खेती की जरूरत
विशेषज्ञों ने समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन (Integrated Nutrient Management) को भविष्य की कृषि के लिए अनिवार्य बताया।
इसमें रासायनिक और जैविक उर्वरकों का संतुलित मिश्रण शामिल है — जिससे उत्पादन भी बना रहे और मिट्टी की सेहत भी खराब न हो।
वैश्विक संकट का Chhattisgarh पर असर — ईरान कनेक्शन
यह Chhattisgarh Krishi News सिर्फ एक training program नहीं है — इसके पीछे एक बड़ा वैश्विक कारण भी है।
विशेषज्ञों ने बताया कि दक्षिण-पूर्व एशिया और विशेषकर ईरान में जारी संघर्ष के कारण पेट्रोलियम उत्पादों और उर्वरक निर्माण में उपयोग होने वाले कच्चे माल के आयात पर संभावित असर पड़ सकता है।
वैश्विक अनिश्चितता में छत्तीसगढ़ की आत्मनिर्भर रणनीति
इसी अनिश्चितता को देखते हुए राज्य सरकार ने वैकल्पिक पोषक स्रोतों को बढ़ावा देने की पहल तेज कर दी है।
छत्तीसगढ़ ने टिकाऊ कृषि की दिशा में यह कदम उठाकर न केवल अपने किसानों को सुरक्षित किया, बल्कि आत्मनिर्भर कृषि की मिसाल भी पेश की।
यह पहल बताती है कि राज्य सरकार वैश्विक समस्याओं के स्थानीय समाधान तलाशने में सक्षम है।
📢 हर बड़ी Chhattisgarh News सबसे पहले पाएं — अभी Join करें: 👉 https://whatsapp.com/channel/0029VaOjosfFHWq7ssCngl1j
Chhattisgarh Krishi News — 150 अधिकारियों को मिला व्यावहारिक प्रशिक्षण
कौन-कौन थे उपस्थित?
इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में IGKV के कुलपति डॉ. गिरिश चंदेल सहित राज्य के विभिन्न जिलों से आए 150 से अधिक कृषि अधिकारी, वैज्ञानिक और कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) के प्रतिनिधि उपस्थित थे।
इतनी बड़ी संख्या में अधिकारियों और वैज्ञानिकों की उपस्थिति यह बताती है कि राज्य सरकार इस मुद्दे को कितनी गंभीरता से ले रही है।
नीली-हरी शैवाल उत्पादन का Live Demo
कार्यक्रम में सिर्फ theoretical sessions ही नहीं हुए — बल्कि अधिकारियों और वैज्ञानिकों को व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया गया।
नीली-हरी शैवाल उत्पादन की तकनीक का live demonstration किया गया, ताकि अधिकारी इसे सीधे गाँवों में जाकर किसानों को सिखा सकें।
खरीफ सीजन की रणनीति पर विशेष चर्चा
इसके अलावा खरीफ सीजन के लिए इन जैविक विकल्पों के व्यापक उपयोग की रणनीति पर भी गहन चर्चा हुई।
इसमें यह तय किया गया कि किस जिले में कितनी मात्रा में जैव उर्वरकों की जरूरत है और उसकी आपूर्ति कैसे सुनिश्चित की जाएगी।
🔗 DoFollow: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) — जैव उर्वरक जानकारी
खरीफ सीजन से पहले गांव-गांव पहुँचेगी तकनीक
APC शहला निगार के निर्देशानुसार अगले 2-3 महीनों में इन तकनीकों को गाँव-गाँव तक पहुँचाने की योजना है।
इसके लिए कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) की भूमिका सबसे अहम होगी। प्रशिक्षित अधिकारी और वैज्ञानिक अपने-अपने जिलों में जाकर किसानों को demo और training देंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन वैकल्पिक उपायों को प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो:
- रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटेगी
- किसानों की लागत में कमी आएगी
- मृदा स्वास्थ्य में सुधार होगा
- पर्यावरण प्रदूषण कम होगा
Chhattisgarh Krishi News का बड़ा संदेश
Chhattisgarh Krishi News में यह प्रशिक्षण कार्यक्रम एक ऐतिहासिक पहल साबित हो सकता है। जब पूरी दुनिया में उर्वरकों की कमी और महँगाई की मार है, तब छत्तीसगढ़ ने अपने किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक ठोस कदम उठाया है।
हरित खाद, नीली-हरी शैवाल और जैव उर्वरकों से 50% तक पोषण की व्यवस्था — यह न सिर्फ किसानों की जेब को राहत देगी, बल्कि मिट्टी की सेहत और पर्यावरण को भी बचाएगी।
IGKV में प्रशिक्षित 150 से अधिक अधिकारी और वैज्ञानिक अब राज्य के हर गाँव तक यह संदेश पहुँचाएंगे। Chhattisgarh Krishi News में यह पहल राज्य के कृषि इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत है — सतत, पर्यावरण-अनुकूल और आत्मनिर्भर कृषि की ओर।
