Chhattisgarh High Court का बड़ा फैसला 1 आदेश रद्द, रजिस्ट्रार को बड़ी राहत

Chhattisgarh High Court के एक अहम फैसले ने राज्य की विश्वविद्यालय सेवा से जुड़े अधिकारियों की नियुक्ति और ट्रांसफर को लेकर स्पष्ट संदेश दिया है। रायपुर स्थित हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक विश्वविद्यालय रजिस्ट्रार को उच्च शिक्षा आयुक्त कार्यालय में अटैच किया गया था। अदालत ने कहा कि यह कदम विश्वविद्यालय सेवा से जुड़े कानूनों के खिलाफ है। इस फैसले से न सिर्फ याचिकाकर्ता रजिस्ट्रार को राहत मिली है, बल्कि राज्य की विश्वविद्यालय प्रणाली में सेवा नियमों को लेकर एक महत्वपूर्ण नजीर भी स्थापित हुई है।


Chhattisgarh High Court: रजिस्ट्रार को गैर-विश्वविद्यालय विभाग में पोस्ट करना नियमों के खिलाफ

Chhattisgarh High Court के जस्टिस पार्थ प्रतिम साहू की एकल पीठ ने 9 फरवरी को यह फैसला सुनाया। अदालत ने राज्य सरकार के 15 मार्च 2024 के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें रजिस्ट्रार बिनोद कुमार एक्का को उच्च शिक्षा आयुक्त के कार्यालय में अटैच किया गया था।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रजिस्ट्रार का पद छत्तीसगढ़ विश्वविद्यालय अधिनियम 1973 के तहत एक वैधानिक पद है। इसके साथ ही यह पद State Universities Service Rules 1983 के नियमों के अंतर्गत संचालित होता है। इन नियमों के अनुसार, विश्वविद्यालय सेवा में कार्यरत अधिकारियों का ट्रांसफर केवल एक विश्वविद्यालय से दूसरे विश्वविद्यालय में ही किया जा सकता है।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि राज्य सरकार को किसी भी रजिस्ट्रार को विश्वविद्यालय के बाहर किसी अन्य विभाग में पोस्ट करने का अधिकार नहीं है। इसलिए सरकार द्वारा जारी किया गया आदेश “de hors the rules” यानी नियमों के बाहर माना गया और इसे अस्थिर करार दिया गया।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता नीरज चौबे ने अदालत में दलील दी कि बिनोद कुमार एक्का को 2016 में रजिस्ट्रार पद पर पदोन्नत किया गया था और उनकी पोस्टिंग संत गहिरा गुरु विश्वविद्यालय, सरगुजा में हुई थी। लेकिन सरकार ने उन्हें उच्च शिक्षा आयुक्त कार्यालय में अटैच कर दिया, जो पूरी तरह से सेवा नियमों के विपरीत था।

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अदालत ने सभी तथ्यों और दस्तावेजों की जांच के बाद याचिका को स्वीकार करते हुए राज्य सरकार के आदेश को रद्द कर दिया।


मामला कैसे शुरू हुआ

इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब राज्य सरकार ने 15 मार्च 2024 को आदेश जारी कर बिनोद कुमार एक्का को उच्च शिक्षा आयुक्त कार्यालय से अटैच कर दिया। सरकार का कहना था कि विश्वविद्यालय में उनके कार्यकाल के दौरान कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच की जा रही है।

हालांकि, याचिकाकर्ता ने अदालत में दलील दी कि उनके खिलाफ किसी भी प्रकार की विभागीय जांच शुरू नहीं हुई है। उन्होंने सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत प्राप्त दस्तावेज भी अदालत के सामने प्रस्तुत किए। इन दस्तावेजों से स्पष्ट हुआ कि उनके खिलाफ कोई औपचारिक विभागीय जांच नहीं चल रही थी।

इसके अलावा उन्होंने यह भी बताया कि उच्च शिक्षा आयुक्त कार्यालय में रजिस्ट्रार का कोई स्वीकृत पद ही नहीं है। इसलिए उन्हें वहां अटैच करना पूरी तरह से गैरकानूनी है।

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Key Facts

  • Chhattisgarh High Court ने राज्य सरकार का 15 मार्च 2024 का आदेश रद्द किया।
  • रजिस्ट्रार बिनोद कुमार एक्का को उच्च शिक्षा आयुक्त कार्यालय में अटैच किया गया था।
  • अदालत ने कहा कि रजिस्ट्रार का ट्रांसफर केवल एक विश्वविद्यालय से दूसरे विश्वविद्यालय में ही हो सकता है।
  • कोर्ट ने आदेश को “नियमों के बाहर” बताते हुए अस्थिर करार दिया।
  • RTI दस्तावेजों में यह भी सामने आया कि एक्का के खिलाफ कोई विभागीय जांच शुरू नहीं हुई थी।

विश्वविद्यालय सेवा नियमों पर बड़ा असर

Chhattisgarh High Court के इस फैसले का असर केवल एक मामले तक सीमित नहीं रहेगा। यह निर्णय राज्य की पूरी विश्वविद्यालय सेवा प्रणाली के लिए एक मार्गदर्शक की तरह माना जा रहा है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि विश्वविद्यालय सेवा से जुड़े अधिकारियों की नियुक्ति और ट्रांसफर केवल निर्धारित नियमों के तहत ही हो सकते हैं। राज्य सरकार या कोई अन्य प्रशासनिक प्राधिकरण इन नियमों से बाहर जाकर आदेश जारी नहीं कर सकता।

शिक्षा जगत से जुड़े लोगों ने भी इस फैसले का स्वागत किया है। उनका कहना है कि इससे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और सेवा नियमों की मजबूती बनी रहेगी।

अधिक जानकारी के लिए आप

जैसी वेबसाइटों पर संबंधित कानूनी प्रावधान पढ़ सकते हैं।


Chhattisgarh High Court के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि विश्वविद्यालय सेवा से जुड़े पदों के लिए तय कानून और नियमों का पालन अनिवार्य है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी रजिस्ट्रार को विश्वविद्यालय के बाहर किसी अन्य सरकारी कार्यालय में अटैच करना वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन है। इस फैसले से न केवल याचिकाकर्ता को राहत मिली, बल्कि भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक मजबूत कानूनी मिसाल भी स्थापित हो गई है।

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