Chhattisgarh High Court ने एक ऐसे मामले में न्याय की एक नई उम्मीद जगाई है, जो दशकों से लंबित था। यह मामला जशपुर जिले के एक कथित फर्जी पुलिस एनकाउंटर से जुड़ा है, जिसमें एक निर्दोष व्यक्ति की जान गई थी।
न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी ने इस मामले में जशपुर जिला कलेक्टर को निर्देश दिया कि वे संझो बाई द्वारा दायर लंबित मुआवज़ा आवेदन पर औपचारिक रूप से निर्णय लें।
यह मामला उस समय की याद दिलाता है जब पुलिसिया ज़्यादती और फर्जी एनकाउंटर आम बात हुआ करते थे। लेकिन Chhattisgarh High Court के इस हस्तक्षेप ने यह स्पष्ट कर दिया कि न्याय में देरी हो सकती है, लेकिन न्याय से इनकार नहीं हो सकता।
जशपुर फर्जी एनकाउंटर — रामनाथ राम की हत्या की कहानी
Chhattisgarh High Court: किसकी मौत पर उठे सवाल?
यह दर्दनाक कहानी है स्वर्गीय रामनाथ राम की, जो जशपुर जिले के एक साधारण नागरिक थे।
कांसाबेल पुलिस थाने के कर्मियों द्वारा रामनाथ राम को एक कथित मुठभेड़ में मार दिया गया था।
पुलिस ने नक्सली बताया — जांच में निकला झूठ
पुलिस ने शुरू में रामनाथ राम को “नक्सली” बताकर इस हत्या को एनकाउंटर करार दिया। यह एक ऐसी रणनीति थी जिससे पुलिस कर्मी अपनी कार्रवाई को जायज़ ठहरा सकें।
लेकिन बाद की जांच में यह पूरी तरह साबित हो गया कि यह मुठभेड़ फर्जी (Fake Encounter) थी। रामनाथ राम एक निर्दोष नागरिक थे, जिन्हें बेरहमी से मार दिया गया था।
इस खुलासे ने न केवल पुलिस की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए, बल्कि संझो बाई और उनके परिवार की ज़िंदगी को हमेशा के लिए बदल दिया।
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2002 में सेशन कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला — SHO समेत 6 पुलिसकर्मी दोषी
न्याय की पहली जीत — अदालत में दोषी साबित हुए पुलिसकर्मी
11 जून 2002 को सेशन कोर्ट ने इस मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया।
⚖️ दोषसिद्धि का विवरण:
| आरोपी | धारा | अपराध |
|---|---|---|
| तत्कालीन SHO HR अहरवात | IPC धारा 304-I | गैर इरादतन हत्या (Culpable Homicide Not Amounting to Murder) |
| 5 अन्य पुलिसकर्मी | IPC धारा 323/34 | स्वेच्छा से चोट पहुँचाना / संयुक्त दायित्व |
तत्कालीन SHO HR अहरवात को IPC की धारा 304-I के तहत गैर इरादतन हत्या का दोषी ठहराया गया। यह धारा तब लगाई जाती है जब कोई व्यक्ति किसी की मौत का कारण बनता है, भले ही उसका इरादा हत्या का न रहा हो।
पाँच अन्य पुलिसकर्मियों को IPC की धारा 323/34 के तहत दोषी पाया गया, जो स्वेच्छा से चोट पहुँचाने और संयुक्त आपराधिक दायित्व से संबंधित है।
इस फैसले ने रामनाथ राम की निर्दोषता और उनकी मौत की गैरकानूनी प्रकृति को कानूनी रूप से प्रमाणित कर दिया।
संझो बाई की 20 साल की लड़ाई — नौकरशाही के सामने बेबस विधवा
Chhattisgarh High Court: न्याय मिला, मुआवज़ा नहीं मिला
सेशन कोर्ट के फैसले ने रामनाथ राम की हत्या को गैरकानूनी साबित कर दिया। लेकिन संझो बाई के लिए यह लड़ाई यहीं खत्म नहीं हुई।
आपराधिक दोषसिद्धि के बावजूद — जो उनके पति की निर्दोषता का सबसे बड़ा सबूत थी — वित्तीय मुआवज़े के लिए उनके प्रयास नौकरशाही की लापरवाही के चलते अनसुने रहे।
मुआवज़ा आवेदन — जो महीनों तक धूल खाता रहा
24 सितंबर 2024 को संझो बाई ने जशपुर कलेक्टर को मुआवज़े का औपचारिक आवेदन दिया। लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।
यह वह दर्दनाक सच्चाई है जो भारत की नौकरशाही व्यवस्था की विफलता को उजागर करती है। एक विधवा महिला, जिसके पति को फर्जी एनकाउंटर में मारा गया, जो दशकों से न्याय के लिए भटक रही थी — उसका मुआवज़ा आवेदन भी महीनों तक अनिर्णीत पड़ा रहा।
Chhattisgarh High Court का हस्तक्षेप इसीलिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
Chhattisgarh High Court में याचिका — वकील चंद्रसेन चौहान की दलील
हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया — सरल लेकिन अहम माँग
जब जशपुर कलेक्टर से कोई जवाब नहीं मिला, तो संझो बाई ने Chhattisgarh High Court का दरवाज़ा खटखटाया।
उनकी पैरवी अधिवक्ता चंद्रसेन चौहान ने की। उन्होंने हाईकोर्ट में एक रिट याचिका दायर की, जिसमें एक साधारण लेकिन न्यायसंगत माँग रखी गई —
“सरकार को उनके लंबित अनुरोध पर कार्रवाई करने के लिए बाध्य किया जाए।”
राज्य सरकार की ओर से कोई आपत्ति नहीं
Chhattisgarh High Court में सुनवाई के दौरान छत्तीसगढ़ राज्य के वकील ने याचिकाकर्ता की समयबद्ध निर्णय की माँग पर कोई आपत्ति नहीं जताई।
यह एक महत्वपूर्ण पहलू है, क्योंकि इससे यह स्पष्ट हुआ कि राज्य सरकार स्वयं मानती है कि संझो बाई के मामले में न्याय होना चाहिए।
Chhattisgarh High Court का आदेश — 15 दिन और 45 दिन की समयसीमा
न्यायमूर्ति चंद्रवंशी का स्पष्ट और समयबद्ध निर्देश
Chhattisgarh High Court के न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी ने याचिका की सीमित प्रकृति को समझते हुए मुआवज़े की विशिष्ट राशि के गुण-दोष में जाए बिना रिट याचिका का निस्तारण कर दिया।
⏱️ Chhattisgarh High Court का समयबद्ध आदेश:
| किसके लिए | क्या करना है | समयसीमा |
|---|---|---|
| संझो बाई (याचिकाकर्ता) | कोर्ट के आदेश सहित नया मुआवज़ा आवेदन कलेक्टर को जमा करना | 15 दिन के भीतर |
| जशपुर जिला कलेक्टर | मुआवज़ा आवेदन पर निर्णय लेना | आदेश प्राप्त होने के 45 दिन के भीतर |
इस आदेश का महत्व क्यों है?
Chhattisgarh High Court का यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि:
🔵 समयबद्धता सुनिश्चित हुई: अब जशपुर कलेक्टर के पास कोई विकल्प नहीं है — उन्हें 45 दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से निर्णय लेना होगा।
🔵 नौकरशाही की ढिलाई पर लगाम: जो काम महीनों में नहीं हुआ, वह अब कानूनी बाध्यता के कारण 45 दिनों में पूरा होगा।
🔵 न्यायिक पर्यवेक्षण: Chhattisgarh High Court का यह आदेश कोर्ट रिकॉर्ड का हिस्सा है, जिससे कोई भी अधिकारी इसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता।
🔵 संझो बाई को न्याय की उम्मीद: दशकों की लड़ाई के बाद संझो बाई को अंततः यह भरोसा मिला है कि उनके पति की निर्मम हत्या का मुआवज़ा अब दिया जाएगा।
🌐 DoFollow Links:
🔗 Chhattisgarh High Court आधिकारिक वेबसाइट: https://highcourt.cg.gov.in
🔗 National Human Rights Commission (NHRC) — Fake Encounter Guidelines: https://nhrc.nic.in
Chhattisgarh High Court और न्याय की उम्मीद
Chhattisgarh High Court का यह आदेश सिर्फ एक विधवा महिला की व्यक्तिगत जीत नहीं है — यह उस न्यायिक व्यवस्था की ताकत का प्रमाण है जो दशकों बाद भी न्याय दिलाने में सक्षम है।
संझो बाई की कहानी उन हज़ारों परिवारों की कहानी है, जो फर्जी एनकाउंटर, पुलिसिया ज़्यादती और नौकरशाही की उदासीनता का शिकार हुए और वर्षों तक न्याय के लिए भटकते रहे।
जशपुर जिला कलेक्टर को अब 45 दिनों के भीतर इस मुआवज़ा आवेदन पर निर्णय लेना है। यह Chhattisgarh High Court का वह आदेश है जो नौकरशाही की सुस्ती पर न्यायिक अंकुश लगाता है।
Chhattisgarh High Court के न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी के इस फैसले ने यह साबित किया कि न्याय में भले ही देर हो, अंधेर नहीं। संझो बाई और उनके परिवार की दशकों की पीड़ा अब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँच रही है।
