Chhattisgarh High Court: नक्सल क्षेत्र में 213 दिन गैरहाजिर कांस्टेबल की बर्खास्तगी सही — HC ने खारिज की याचिका, जानें 5 बड़े तथ्य

Chhattisgarh High Court ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसले में स्पष्ट किया है कि नक्सलग्रस्त क्षेत्र में तैनात पुलिसकर्मी की लंबी और अनधिकृत अनुपस्थिति को केवल “तकनीकी चूक” नहीं माना जा सकता।

न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने बस्तर जिले में तैनात एक कांस्टेबल की याचिका खारिज करते हुए यह ऐतिहासिक टिप्पणी की। कांस्टेबल ने अपनी बर्खास्तगी के आदेश को रद्द करने, पुनर्नियुक्ति, वरिष्ठता बहाली, पूर्ण बकाया वेतन और सभी सेवा लाभ दिए जाने की मांग की थी।

2 अप्रैल 2026 को आए इस फैसले में कोर्ट ने कहा कि एक वर्दीधारी सुरक्षा बल में लंबे समय तक बिना अनुमति के अनुपस्थित रहना अनुशासन, अभियानगत तैयारी और संस्थागत अखंडता को गहरी क्षति पहुंचाता है।


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कांस्टेबल की 213 दिन की अनधिकृत अनुपस्थिति — पूरी Timeline

बस्तर के पुलिस कैंप जरामगांव से हुआ था गायब

याचिकाकर्ता कांस्टेबल बस्तर जिले के पुलिस कैंप जरामगांव में तैनात था — यह क्षेत्र नक्सली गतिविधियों के लिए अत्यंत संवेदनशील माना जाता है।

वह 13 जून 2018 से 12 जनवरी 2019 तक लगातार 213 दिनों तक बिना किसी पूर्व अवकाश स्वीकृति या उचित सूचना के अनुपस्थित रहा।

विभागीय जांच और बर्खास्तगी का आदेश

लंबी अनुपस्थिति के बाद विभागीय जांच हुई। बस्तर के पुलिस अधीक्षक (SP) ने 4 अक्टूबर 2019 को उसे सेवा से बर्खास्त करने का आदेश जारी किया।

इस आदेश को पुलिस महानिरीक्षक (अपीलीय प्राधिकार) और पुलिस महानिदेशक (दया याचिका) दोनों स्तरों पर बरकरार रखा गया। इसके बाद कांस्टेबल ने Chhattisgarh High Court का दरवाजा खटखटाया।


कांस्टेबल का पक्ष — क्या थी दलीलें?

“मजबूरी में हुई अनुपस्थिति” — याचिकाकर्ता की दलील

कांस्टेबल के अधिवक्ता रूप राम नाईक ने दलील दी कि उनके मुवक्किल की अनुपस्थिति जानबूझकर नहीं बल्कि व्यक्तिगत विपरीत परिस्थितियों के कारण थी।

इन परिस्थितियों में शामिल थे — उनके दत्तक चाचा की मृत्यु, खुद उनकी खराब स्वास्थ्य स्थिति, और पत्नी की गर्भावस्था। इन्हीं आधारों पर उन्होंने अनुपस्थिति को उचित ठहराने की कोशिश की।

प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन का आरोप

अधिवक्ता ने यह भी तर्क दिया कि विभागीय जांच प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन में की गई।

उनका कहना था कि कार्यवाही शुरू करने से पहले उचित कारण बताओ नोटिस नहीं दिया गया, गवाहों की जिरह करने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया, और जांच रिपोर्ट के विरुद्ध लिखित प्रतिवेदन देने का भी अवसर नहीं मिला।


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राज्य सरकार का रुख — “आदतन अनुशासनहीन”

7 बार पहले भी मिल चुकी थी सजा

राज्य सरकार की ओर से पैनल वकील अर्पित अग्रवाल ने अदालत के सामने एक महत्वपूर्ण तथ्य रखा।

उन्होंने बताया कि यह कांस्टेबल कोई पहली बार अनुशासनहीनता करने वाला व्यक्ति नहीं था। उसे पांच लघु और दो प्रमुख दंड इससे पहले भी इसी प्रकार के कदाचार के लिए दिए जा चुके थे।

बार-बार नोटिस के बाद भी नहीं आया ड्यूटी पर

राज्य ने यह भी तर्क दिया कि बार-बार नोटिस जारी करने और ड्यूटी पर लौटने के निर्देशों के बावजूद, याचिकाकर्ता न तो ड्यूटी पर लौटा और न ही अपनी अनुपस्थिति का कोई समकालीन स्पष्टीकरण दिया।

यही कारण रहा कि अधिकारियों ने उसे “आदतन अनुशासनहीन” कर्मचारी करार दिया, जो सुरक्षा बल में बनाए रखने योग्य नहीं था।


Chhattisgarh High Court ने क्या कहा? — जानें अहम टिप्पणियां

“अनधिकृत अनुपस्थिति सेवा अनुशासन का गंभीर उल्लंघन”

Chhattisgarh High Court ने अपने आदेश में विभागीय जांच की पूरी प्रक्रिया की समीक्षा की और पाया कि यह निर्धारित सेवा नियमों के अनुसार ही की गई थी।

कोर्ट ने रेखांकित किया कि कांस्टेबल को आरोप-पत्र दिया गया था, जांच अधिकारी और प्रस्तुतकर्ता अधिकारी नियुक्त किए गए थे, कार्यवाही में भाग लेने, गवाहों से जिरह करने और बचाव साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया था, तथा दंड लगाए जाने से पहले जांच रिपोर्ट की प्रति भी सौंपी गई थी।

बार-बार मिले मौकों का उपयोग नहीं किया — HC की कड़ी टिप्पणी

कोर्ट ने यह भी कहा कि अनुस्मारक दिए जाने के बावजूद याचिकाकर्ता ने इनमें से कई अवसरों का उपयोग नहीं किया।

अदालत ने निष्कर्ष दिया कि “प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन का दावा रिकॉर्ड से सिद्ध नहीं होता। इसके विपरीत, बार-बार नोटिस और अवसर दिए जाने के बावजूद याचिकाकर्ता समय पर स्पष्टीकरण नहीं दे सका।”

अनुशासनिक प्राधिकारी ने जांच रिपोर्ट, प्रस्तुत साक्ष्य और याचिकाकर्ता के पूर्व सेवा रिकॉर्ड के स्वतंत्र विचार के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि कदाचार प्रमाणित हुआ है और याचिकाकर्ता आदतन अनुशासनहीनता के कारण सेवा में बनाए रखने योग्य नहीं है।


नक्सलग्रस्त क्षेत्र में अनुशासन क्यों है जरूरी?

बस्तर — भारत का सबसे संवेदनशील सुरक्षा क्षेत्र

बस्तर जिला और उसके आसपास का क्षेत्र दशकों से नक्सली हिंसा का केंद्र रहा है। यहां तैनात पुलिसकर्मियों की हर गतिविधि का सीधा असर सुरक्षा अभियानों की सफलता पर पड़ता है।

दक्षिण एशिया आतंकवाद पोर्टल के अनुसार, नक्सली संघर्ष में वर्ष 2000 से 2025 के बीच 12,000 से अधिक लोगों की जान गई है, जिनमें 2,722 सुरक्षाबल कर्मी शामिल हैं।

ऐसे संवेदनशील माहौल में यदि कोई कांस्टेबल बिना सूचना के 213 दिन गायब रहे, तो यह न केवल उसकी टुकड़ी की ताकत को कमजोर करता है, बल्कि अन्य साथियों की जान को भी खतरे में डाल सकता है।

सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट का एकमत रुख

यह पहली बार नहीं है जब किसी अदालत ने नक्सलग्रस्त क्षेत्र में तैनात सुरक्षाकर्मी की अनुपस्थिति को गंभीर अनुशासनहीनता माना हो। देशभर की अदालतें एकमत हैं कि वर्दीधारी बल में अनुशासन सर्वोपरि है, विशेषतः संवेदनशील और युद्ध-सदृश क्षेत्रों में।


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Chhattisgarh High Court का यह फैसला क्यों है ऐतिहासिक?

Chhattisgarh High Court का यह फैसला राज्य के सुरक्षाबल प्रशासन के लिए एक स्पष्ट और कड़ा संदेश है — नक्सलग्रस्त क्षेत्र में ड्यूटी से गायब रहना किसी भी कारण से उचित नहीं ठहराया जा सकता।

न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की यह टिप्पणी कि “यह तकनीकी चूक नहीं बल्कि संस्थागत अखंडता का हनन है” — आने वाले समय में इसी प्रकार के मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल बनेगी।

Chhattisgarh High Court के इस निर्णय से राज्य के पुलिस विभाग में अनुशासन और जवाबदेही की संस्कृति और मजबूत होगी। ऐसे फैसले न केवल पुलिसकर्मियों को बल्कि प्रशासनिक अधिकारियों को भी यह याद दिलाते हैं कि कर्तव्य से पलायन के गंभीर परिणाम होते हैं।

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