Chhattisgarh HC Divorce से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला हाल ही में सामने आया है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सात साल तक चले वैवाहिक विवाद के बाद पति को तलाक देने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि समाज में दहेज और क्रूरता के आरोप सार्वजनिक रूप से लगने पर व्यक्ति की प्रतिष्ठा को गहरा नुकसान होता है। कोर्ट के अनुसार, यदि आरोप अंत में साबित नहीं होते, तब भी उनका असर लंबे समय तक बना रहता है। इस मामले में पत्नी द्वारा लगाए गए आरोप अदालत में साबित नहीं हो पाए। इसलिए हाईकोर्ट ने मानसिक क्रूरता और परित्याग को तलाक का आधार माना।
Chhattisgarh HC Divorce मामले में हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
Chhattisgarh HC Divorce मामले की सुनवाई जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की खंडपीठ ने की। यह अपील पति की ओर से दायर की गई थी। पति ने जनवरी 2023 में पारिवारिक न्यायालय द्वारा तलाक की याचिका खारिज किए जाने के आदेश को चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट ने अपने 3 मार्च के आदेश में कहा कि किसी व्यक्ति का आपराधिक मामले में बरी होना केवल मुकदमे का अंत नहीं होता। अदालत ने टिप्पणी की कि समाज में ऐसे आरोप व्यक्ति और उसके परिवार की प्रतिष्ठा को पहले ही नुकसान पहुंचा देते हैं।
कोर्ट ने कहा कि पति को सात साल तक मुकदमे का सामना करना पड़ा। इसके कारण उसे मानसिक पीड़ा और सामाजिक अपमान झेलना पड़ा। अदालत ने यह भी कहा कि पत्नी द्वारा लगाए गए दहेज और क्रूरता के आरोप अदालत में साबित नहीं हो सके।
न्यायालय के अनुसार, बिना आधार के लगाए गए ऐसे गंभीर आरोप मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आते हैं। कोर्ट ने माना कि लंबे समय तक चले मुकदमे ने पति के मन पर स्थायी असर डाला है।
अंततः हाईकोर्ट ने कहा कि पति तलाक का हकदार है और दोनों के बीच हुआ विवाह समाप्त किया जाता है।
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अधिक जानकारी के लिए न्यायिक प्रक्रिया से संबंधित विवरण यहां देखा जा सकता है:
सात साल पुराना वैवाहिक विवाद
इस Chhattisgarh HC Divorce मामले की शुरुआत फरवरी 2015 में हुई शादी से जुड़ी है। दोनों का विवाह हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था।
पति का कहना था कि शादी के बाद पत्नी केवल 10 से 11 दिन तक उसके साथ रही। इसके बाद वह अपने मायके चली गई।
पति ने अदालत में बताया कि पत्नी उस पर लगातार दबाव डालती थी। वह चाहती थी कि पति अपने बुजुर्ग और बीमार माता-पिता से अलग होकर रहे।
पति ने यह भी आरोप लगाया कि यदि वह ऐसा नहीं करता, तो पत्नी झूठे मामले में फंसाने की धमकी देती थी।
इसके बाद जुलाई 2017 से पत्नी अलग रहने लगी। फिर 2018 में उसने पति और उसके परिवार के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई।
इस एफआईआर में भारतीय दंड संहिता की धारा 498A और छत्तीसगढ़ टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम 2005 के तहत आरोप लगाए गए थे।
हालांकि जून 2025 में अदालत ने पति, उसके दो भाइयों, पिता और माता को इन आरोपों से बरी कर दिया।
Key Facts: Chhattisgarh HC Divorce
- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक दिया।
- पति और उसके परिवार को जून 2025 में सभी आरोपों से बरी किया गया।
- पत्नी 2017 से अलग रह रही थी।
- सात साल तक दोनों अलग-अलग रहे और सुलह की कोशिश नहीं हुई।
- अदालत ने इसे वैवाहिक संबंध का स्थायी टूटना माना।
Image Alt Text: Chhattisgarh HC Divorce
कानूनी प्रतिक्रियाएं
Chhattisgarh HC Divorce फैसले को कई कानूनी विशेषज्ञ महत्वपूर्ण मान रहे हैं। उनका कहना है कि यह फैसला वैवाहिक विवादों में झूठे आरोपों के प्रभाव को समझने के लिए अहम उदाहरण बन सकता है।
कानून विशेषज्ञों के अनुसार, अदालत ने स्पष्ट किया कि गंभीर आरोप यदि साबित नहीं होते, तो वे मानसिक क्रूरता माने जा सकते हैं।
इस फैसले में अदालत ने यह भी कहा कि सात साल तक अलग रहना और सुलह की कोई कोशिश न होना, वैवाहिक संबंध के टूटने का संकेत है।
हालांकि पत्नी की ओर से वकील अमन केशरवानी ने कहा कि वे बरी होने के आदेश के खिलाफ अपील दायर करेंगे।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पत्नी चाहें तो अलग आवेदन देकर स्थायी भरण-पोषण की मांग कर सकती हैं।
Chhattisgarh HC Divorce फैसला एक लंबे वैवाहिक विवाद का अंत लेकर आया है। अदालत ने माना कि बिना सबूत के लगाए गए गंभीर आरोप मानसिक क्रूरता बन सकते हैं।
साथ ही सात साल तक अलग रहना भी विवाह के स्थायी टूटने का संकेत माना गया। इस निर्णय से साफ है कि Chhattisgarh HC Divorce मामलों में अदालत अब रिश्ते की वास्तविक स्थिति और मानसिक प्रभाव को भी गंभीरता से देख रही है।
