Bilaspur HC Parole से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मामला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में सामने आया है, जिसने कैदियों के अधिकारों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। बिलासपुर सेंट्रल जेल में बंद 68 वर्षीय कैदी ने गंभीर बीमारी के चलते पैरोल की मांग की थी। उसका कहना था कि उसे तत्काल बेहतर इलाज की जरूरत है। जब लंबे समय तक आवेदन पर निर्णय नहीं हुआ, तो उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान अदालत ने माना कि जीवन के अधिकार में समय पर चिकित्सा उपचार भी शामिल है और प्रशासन को देरी पर फटकार लगाई।
Bilaspur HC Parole: गंभीर बीमारी के कारण मांगी पैरोल
Bilaspur HC Parole मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने की। यह याचिका बिलासपुर केंद्रीय जेल में बंद 68 वर्षीय कैदी की ओर से दायर की गई थी।
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि वह गंभीर संक्रमण से जूझ रहा है। इस संक्रमण के कारण पहले ही उसके पैर की एक उंगली काटनी पड़ी थी। यह सर्जरी डॉ. भीमराव अंबेडकर मेमोरियल अस्पताल में की गई थी।
हालांकि बाद की मेडिकल रिपोर्ट में बताया गया कि संक्रमण अभी भी फैल रहा है। यदि तुरंत उपचार नहीं मिला, तो उसके पैरों को और काटना पड़ सकता है।
इसी कारण कैदी ने छत्तीसगढ़ कैदी अवकाश नियम, 1989 के तहत पैरोल मांगी। उसने कहा कि वह अपने खर्च पर निजी अस्पताल में इलाज करवाना चाहता है।
कैदी के वकील चंद्रकादित्य पांडे ने अदालत को बताया कि पैरोल आवेदन जिला मजिस्ट्रेट के पास भेजा गया था, लेकिन अब तक उस पर निर्णय नहीं लिया गया।
इस देरी को उन्होंने मनमाना व्यवहार बताते हुए कहा कि इससे कैदी के मौलिक अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।
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संविधान के अनुच्छेद 21 से जुड़ा मामला
Bilaspur HC Parole मामला केवल एक कैदी की बीमारी तक सीमित नहीं है। यह संविधान में दिए गए जीवन के अधिकार से भी जुड़ा हुआ है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। अदालतों ने कई बार कहा है कि इस अधिकार में स्वास्थ्य और चिकित्सा उपचार भी शामिल है।
इस मामले में राज्य सरकार की ओर से उप शासकीय अधिवक्ता एन. के. जायसवाल ने अदालत में कहा कि पैरोल कोई पूर्ण अधिकार नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि आवेदन पर विचार चल रहा है और जेल प्रशासन कैदी को आवश्यक चिकित्सा सुविधा देने के लिए प्रतिबद्ध है।
हालांकि अदालत ने रिकॉर्ड में मौजूद मेडिकल दस्तावेजों को देखकर माना कि कैदी की हालत गंभीर है और उसे तुरंत उपचार की जरूरत है।
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Key Facts
- बिलासपुर केंद्रीय जेल में बंद 68 वर्षीय कैदी ने पैरोल मांगी
- गंभीर संक्रमण के कारण पहले ही पैर की एक उंगली काटनी पड़ी
- संक्रमण बढ़ने से पैर काटने का खतरा बताया गया
- हाईकोर्ट ने 10 दिन में निर्णय लेने का निर्देश दिया
- अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 21 में समय पर इलाज का अधिकार शामिल
अदालत ने प्रशासन की देरी पर जताई नाराजगी
Bilaspur HC Parole मामले में हाईकोर्ट ने प्रशासनिक देरी पर भी गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि स्वास्थ्य और जीवन से जुड़े मामलों में इस तरह की निष्क्रियता स्वीकार नहीं की जा सकती।
न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि भले ही पैरोल पूर्ण अधिकार नहीं है, लेकिन जब आवेदन गंभीर चिकित्सा आधार पर हो, तो उसे उचित समय में तय करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता की हालत गंभीर दिखाई देती है। मेडिकल दस्तावेज बताते हैं कि संक्रमण फैल रहा है और आगे अंग काटने की नौबत आ सकती है।
इसी कारण अदालत ने सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया कि पैरोल आवेदन पर 10 दिनों के भीतर फैसला किया जाए।
कुल मिलाकर Bilaspur HC Parole मामला यह याद दिलाता है कि जेल में बंद व्यक्ति भी संविधान के अधिकारों से वंचित नहीं होता। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि जीवन के अधिकार में समय पर चिकित्सा उपचार शामिल है। इसलिए प्रशासन को ऐसे मामलों में देरी नहीं करनी चाहिए। अब सबकी नजर इस बात पर है कि अगले दस दिनों में Bilaspur HC Parole आवेदन पर क्या फैसला लिया जाता है।
