दूषित पानी से 18 मौतों पर सियासत तेज, सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल ने जनता को भी ठहराया जिम्मेदार

Contaminated Water Death Case Indore को लेकर पूरे मध्य प्रदेश में आक्रोश का माहौल है। इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी पीने से अब तक 18 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। इस हृदयविदारक घटना के बाद जहां सरकार ने दिशा-निर्देश जारी किए हैं, वहीं नेताओं की बयानबाजी थमने का नाम नहीं ले रही।

ताजा विवादित बयान खंडवा से सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल की ओर से सामने आया है, जिसने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है।


🗣️ “जनता भी बराबर की जिम्मेदार” – सांसद का बयान

सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल ने कहा,

“सरकार ही सब कुछ करे, हम सरकार के भरोसे ही बैठे रहें, यह ठीक नहीं है। इस घटना में जनता की भी बराबर की जवाबदारी बनती है।”

उन्होंने आगे कहा कि इंदौर की इस घटना से सबक लेते हुए लोगों को अपने घरों की पानी की टंकियों की नियमित सफाई करनी चाहिए।

हालांकि, इस बयान के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।


जब पूछा गया– प्रशासन को चेताया गया था, फिर जनता क्यों दोषी?

जब सांसद से यह सवाल किया गया कि जनता ने तो बार-बार प्रशासन को दूषित पानी की शिकायत की थी, फिर उन्हें जिम्मेदार क्यों ठहराया जा रहा है, तो उन्होंने बात को घुमाते हुए कहा कि—

घटना दुर्भाग्यपूर्ण है,
दोषियों पर कार्रवाई हो चुकी है,
और आगे भी जो दोषी होगा, उसे बख्शा नहीं जाएगा।


🕯️ मृतकों के परिवारों के प्रति संवेदना

सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल ने इंदौर में मारे गए लोगों के परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि

“भारतीय जनता पार्टी का पूरा परिवार और राज्य सरकार इस दुख की घड़ी में पीड़ित परिवारों के साथ खड़ी है।”


🧹 सबसे स्वच्छ शहर इंदौर पर उठे सवाल

गौरतलब है कि इंदौर लगातार 8 वर्षों से देश के सबसे स्वच्छ शहरों में शामिल रहा है।
लेकिन सबसे स्वच्छ शहर में दूषित पानी से हुई 18 मौतों ने स्वच्छता के दावों और व्यवस्थाओं की हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

शहर की चमक-दमक और पुरस्कारों के बीच पानी की बुनियादी व्यवस्था में चूक ने यह साफ कर दिया है कि आंकड़ों और जमीनी सच्चाई में बड़ा अंतर हो सकता है।


Contaminated Water Death Case Indore अब सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही, राजनीतिक संवेदनशीलता और शहरी व्यवस्थाओं पर सवाल बन चुका है।
जनता दोषी है या व्यवस्था—इस बहस से इतर, सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भविष्य में ऐसी त्रासदी दोबारा न हो, इसके लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे?