Narayanpur Maoist suicide case: छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले से एक बेहद दर्दनाक और चिंताजनक मामला सामने आया है।
माओवादी हिंसा से जुड़े एक पुराने हत्या मामले में पुलिस की मदद करने वाले 55 वर्षीय व्यक्ति मांकू पड्डा ने कथित तौर पर प्रतिशोध के डर से आत्महत्या कर ली।
यह घटना ऐसे समय सामने आई है, जब वह व्यक्ति कुछ ही घंटे पहले पुलिस को एक माओवादी हत्या के शिकार युवक का शव खोजने में मदद कर चुका था।
Narayanpur Maoist Suicide Case: राष्ट्रीय ध्वज फहराने की मिली थी सजा
पुलिस सूत्रों के अनुसार, मांकू पड्डा बिनागुंडा गांव का निवासी था और पहले कई बार माओवादी कैडरों की मदद कर चुका था। हाल के दिनों में वह मुख्यधारा में लौटना चाहता था और पुलिस के सामने आत्मसमर्पण की तैयारी कर रहा था।
पड्डा ने पुलिस को उस स्थान तक पहुंचाया, जहां मनेश नरेटी का शव दफनाया गया था।
नरेटी की अगस्त 2025 में हत्या कर दी गई थी, क्योंकि उसने गांव के बाहर राष्ट्रीय ध्वज फहराया था।
जन अदालत में मौत की सजा, शव गुप्त स्थान पर दफन
जानकारी के अनुसार, अगस्त में माओवादियों ने नरेटी और दो अन्य ग्रामीणों का अपहरण किया था।
माओवादी संगठन की तथाकथित ‘जन अदालत’ (Jan Adalat) में नरेटी पर मुकदमा चलाया गया और वहीं उसकी हत्या कर दी गई, जबकि अन्य दो ग्रामीणों के साथ मारपीट की गई।
हत्या के बाद शव को गुप्त स्थान पर दफना दिया गया, जिसकी जानकारी अब सामने आई।
प्रतिशोध का डर और ज़हर का घूंट
शव निकलवाने में मदद करने के बाद मांकू पड्डा को माओवादी प्रतिशोध का भय सताने लगा।
पुलिस सूत्रों के मुताबिक, इसी डर के चलते उसने पक्षियों के लिए इस्तेमाल होने वाला ज़हर खा लिया।
परिजनों ने तुरंत पुलिस को सूचना दी और उसे अस्पताल ले जाया गया, लेकिन मंगलवार रात इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।
माओवादी गढ़ बना हुआ है बिनागुंडा गांव
पुलिस का कहना है कि बिनागुंडा गांव लंबे समय से
उत्तर बस्तर डिवीजन की पार्टापुर एरिया कमेटी के अंतर्गत
एक माओवादी बेस कैंप माना जाता है।
अब भी इस क्षेत्र में दो दर्जन से अधिक माओवादी सक्रिय बताए जा रहे हैं, जिससे स्थानीय ग्रामीणों में भय का माहौल बना हुआ है।
दो महीनों में दूसरी आत्महत्या, सुरक्षा पर गंभीर सवाल
यह दो महीनों में दूसरी ऐसी घटना है।
इससे पहले 6 दिसंबर को बीजापुर जिले में
सीआरपीएफ को विस्फोटक बरामद करने में मदद करने वाले
48 वर्षीय आदिवासी मदवी भीमा ने भी प्रतिशोध के डर से आत्महत्या कर ली थी।
निष्कर्ष: सहयोग करने वालों की सुरक्षा सबसे बड़ा सवाल
Narayanpur Maoist suicide case ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि
माओवादी प्रभावित इलाकों में
पुलिस या सुरक्षा बलों की मदद करने वाले नागरिकों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए।
जब तक भयमुक्त वातावरण और मजबूत सुरक्षा व्यवस्था नहीं बनेगी,
ऐसी दर्दनाक घटनाएं प्रशासन और समाज दोनों के लिए चुनौती बनी रहेंगी।
