नई दिल्ली, 12 फरवरी 2026।
Delhi High Court MCOCA Bail में दिल्ली उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र नियंत्रणित संगठित अपराध अधिनियम (MCOCA) के तहत आरोपी हर्ष पाल सिंह उर्फ रुबल को जमानत दी है। अदालत ने यह निर्णय आरोपी के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के कारण लिया, क्योंकि उसे गिरफ्तार होने के बाद 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश नहीं किया गया था।
न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा ने 10 फरवरी 2026 को यह फैसला सुनाया, जिसमें निचली अदालत का वह आदेश रद्द कर दिया गया था जिसने पहले हर्ष पाल को जमानत देने से इंकार किया था।
मामला और विवाद
हर्ष पाल सिंह पर संगठित अपराध सिंडिकेट से जुड़े होने और भारतीय न्याय संहिता, 2023 एवं आर्म्स एक्ट के तहत आरोप थे।
अदालत ने कहा कि विवाद का मुख्य बिंदु गिरफ्तारी और मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत होने के समय की सीमा था। सिंह को 25 सितंबर 2025 की रात अमृतसर एयरपोर्ट से पकड़ा गया, जब वह बैंकॉक जाने की योजना बना रहा था।
इसके बाद उन्हें दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के हवाले किया गया और 27 सितंबर 2025 को विशेष न्यायालय में पेश किया गया।
वकीलों का पक्ष
अभियोजन पक्ष के अनुसार, सिंह को संक्षिप्त पूछताछ के बाद अगले दिन जांच में शामिल होने के नोटिस पर छोड़ा गया।
लेकिन वकील राजनी और निशांत राणा ने अदालत को बताया कि गिरफ्तारी से लेकर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश होने तक का समय 24 घंटे से अधिक हो गया, जो संविधान अनुच्छेद 22 (2) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत अवैध है।
अदालत ने अभियोजन के दावों को “काफी संदेहास्पद” बताया। सामान्य डायरी एंट्री में यह स्पष्ट था कि सिंह के पासपोर्ट और सामान दिल्ली पुलिस के साथ थे और सरकारी वाहन में उन्हें ले जाया गया, जिससे कोई औपचारिक रिहाई संभव नहीं थी।
अदालत का निर्णय
अदालत ने स्पष्ट किया कि 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश होना एक अनिवार्य संवैधानिक अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि यदि यह अवधि पार हो जाए और न्यायिक अनुमति न हो, तो गिरफ्तारी अवैध मानी जाएगी।
हालांकि अभियोजन ने कहा कि सिंह ने पुलिस नोटिस मिलने के तुरंत बाद फ्लाइट बुक करके फरार होने की कोशिश की, अदालत ने कहा कि प्रक्रियात्मक कानून का पालन हमेशा सर्वोपरि है।
इसलिए जमानत कड़ी शर्तों के साथ दी गई है, जिसमें 2 लाख रुपए की व्यक्तिगत जमानत शामिल है।
यह Delhi High Court MCOCA Bail मामला यह दर्शाता है कि गंभीर अपराधों के मामलों में भी संवैधानिक अधिकारों और प्रक्रिया कानून का पालन अनिवार्य है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी गिरफ्तारी में procedural safeguards का उल्लंघन किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं है।
