Chhattisgarh High Court के एक हालिया फैसले ने adoption और compassionate appointment से जुड़े मामलों में नई बहस छेड़ दी है। करीब 22 साल पुराने विवाद में कोर्ट ने एक व्यक्ति को गोद लिया हुआ बेटा मानने से इनकार कर दिया। मामला रेलवे कर्मचारी की मौत के बाद नौकरी पाने के दावे से जुड़ा था। हालांकि, दस्तावेजों और गवाहों की कमी ने पूरे केस की दिशा बदल दी। इस फैसले ने साफ कर दिया कि कानून में प्रक्रिया और प्रमाण दोनों बेहद जरूरी हैं।
Chhattisgarh High Court: 22 साल बाद गोद लेने का दावा क्यों खारिज हुआ
Chhattisgarh High Court ने अपने फैसले में साफ कहा कि गोद लेने की प्रक्रिया कानून के अनुसार साबित नहीं हुई। कोर्ट ने यह भी पाया कि adoption deed कथित गोद लेने के समय तैयार नहीं हुआ था। बल्कि, इसे करीब 22 साल बाद 1998 में रजिस्टर किया गया।
जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू की पीठ ने कहा कि “गोद लेने की सबसे महत्वपूर्ण शर्त ‘give and take ceremony’ होती है, जो इस मामले में साबित नहीं हुई।” गवाहों के बयान भी एक जैसे नहीं थे। किसी ने यह स्पष्ट नहीं बताया कि यह रस्म कहां और कब हुई।
इसके अलावा, गवाहों ने अलग-अलग मौसम का जिक्र किया। इससे केस और कमजोर हो गया। कोर्ट ने यह भी देखा कि adoption deed में 1976 की तारीख लिखी गई थी, लेकिन दस्तावेज 1998 में तैयार और रजिस्टर्ड हुआ।
रेलवे प्रशासन ने भी दलील दी कि जिस समय दस्तावेज रजिस्टर्ड हुआ, उस समय व्यक्ति की उम्र 21 साल से ज्यादा थी। कानून के अनुसार, इतनी उम्र में गोद लेना मान्य नहीं होता।
इन सभी तथ्यों के आधार पर हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को गलत ठहराया और उसे रद्द कर दिया।
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Background
यह मामला एक रेलवे कर्मचारी राव से जुड़ा है, जिनकी 2001 में मृत्यु हो गई थी। दावा करने वाले व्यक्ति ने खुद को उनका गोद लिया बेटा बताया। उसने कहा कि बचपन में, जब वह 5-6 साल का था, तब उसके जैविक माता-पिता ने उसे राव और उनकी पत्नी लक्ष्मी बाई को सौंप दिया था।
उसने यह भी दावा किया कि वह बचपन से अपने कथित दत्तक माता-पिता के साथ रहा। इसके अलावा, उसने यह भी बताया कि राव ने उसे पीएफ और बीमा में nominee बनाया था।
हालांकि, रेलवे प्रशासन ने उसके दावे को खारिज कर दिया। इसके बाद उसने अदालत का दरवाजा खटखटाया। ट्रायल कोर्ट ने उसके पक्ष में फैसला दिया, लेकिन बाद में मामला हाई कोर्ट पहुंचा, जहां पूरा फैसला पलट गया।
Key Facts (Chhattisgarh High Court)
- 1976 में कथित adoption, लेकिन 1998 में रजिस्ट्रेशन
- ‘give and take ceremony’ का कोई ठोस प्रमाण नहीं
- गवाहों के बयानों में विरोधाभास
- 21 साल से अधिक उम्र में adoption अमान्य बताया गया
- हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द किया
Impact और Reactions
Chhattisgarh High Court के इस फैसले का असर सिर्फ एक केस तक सीमित नहीं रहेगा। यह निर्णय भविष्य में ऐसे सभी मामलों के लिए एक मजबूत उदाहरण बनेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि अब adoption से जुड़े मामलों में दस्तावेजी प्रमाण और कानूनी प्रक्रिया को लेकर ज्यादा सख्ती होगी। खासकर compassionate appointment के मामलों में, जहां अक्सर विवाद सामने आते हैं।
इस फैसले से यह भी साफ हो गया कि केवल भावनात्मक दावे या पारिवारिक संबंध पर्याप्त नहीं होते। कानून के तहत हर प्रक्रिया को साबित करना जरूरी है।
हालांकि, कुछ लोग इसे सख्त फैसला मान रहे हैं। उनका कहना है कि अगर व्यक्ति वास्तव में बचपन से उस परिवार में पला-बढ़ा है, तो उसे राहत मिलनी चाहिए थी।
👉 अधिक जानकारी के लिए देखें: https://highcourt.cg.gov.in
👉 कानून से जुड़ी जानकारी: https://lawcommissionofindia.nic.in
Chhattisgarh High Court का यह फैसला स्पष्ट करता है कि कानून में नियमों का पालन सबसे ऊपर है। 22 साल बाद रजिस्टर किए गए दस्तावेज और अधूरी प्रक्रिया ने पूरे केस को कमजोर बना दिया। इस मामले ने यह संदेश दिया है कि adoption जैसे संवेदनशील विषय में कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है। फिलहाल, Chhattisgarh High Court का यह निर्णय न्याय व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण मिसाल बन चुका है।
