आदिवासी ईसाइयों के दफन अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम रोक आदेश

Supreme Court stays exhumation in Chhattisgarh — सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को छत्तीसगढ़ में दफनाए गए शवों को जबरन निकालने (उत्खनन) पर अंतरिम रोक लगा दी। यह आदेश उस जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान दिया गया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि राज्य में आदिवासी ईसाइयों को अपने गांव में मृतकों को दफनाने का अधिकार नहीं दिया जा रहा है।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए स्पष्ट कहा,
“अगले आदेश तक दफनाए गए शवों का कोई और उत्खनन नहीं किया जाएगा।”


क्या है पूरा मामला?

यह मामला Supreme Court stays exhumation in Chhattisgarh आदेश से पहले उस समय सुर्खियों में आया था, जब कुछ गांवों में कथित रूप से ईसाई समुदाय के लोगों को गांव के कब्रिस्तान में अंतिम संस्कार की अनुमति नहीं दी गई।

जनहित याचिका ‘छत्तीसगढ़ एसोसिएशन फॉर जस्टिस एंड इक्वलिटी’ सहित अन्य याचिकाकर्ताओं ने दायर की थी। उन्होंने अदालत से मांग की कि धर्म, जाति या एससी/एसटी/ओबीसी स्थिति के आधार पर किसी को भी अपने गांव में दफनाने से रोका न जाए।


पहले आया था विभाजित फैसला

27 जनवरी 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य याचिका पर विभाजित फैसला दिया था। मामला एक दिवंगत ईसाई पादरी को गांव के कब्रिस्तान या निजी कृषि भूमि में दफनाने की अनुमति से जुड़ा था।

  • न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना ने कहा था कि याचिकाकर्ता को अपने पिता को निजी जमीन पर दफनाने की अनुमति दी जानी चाहिए।
  • वहीं, न्यायमूर्ति एस. सी. शर्मा ने माना कि अंतिम संस्कार की प्रक्रिया मौलिक अधिकारों के तहत आती है, लेकिन “स्थान चुनने का असीमित अधिकार” नहीं है।

हालांकि, चूंकि तीन सप्ताह बीत चुके थे और शव मोर्चरी में रखा था, इसलिए दोनों न्यायाधीशों ने सहमति से कर्कापाल गांव (मूल स्थान से 25-30 किमी दूर) के निर्धारित ईसाई कब्रिस्तान में दफनाने का आदेश दिया था।


याचिकाकर्ताओं का आरोप

वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्विस ने अदालत में दलील दी कि विभाजित फैसले का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है। उनके अनुसार, जहां स्थानीय स्तर पर कोई विवाद नहीं है, वहां भी आदिवासी ईसाइयों को दफनाने से रोका जा रहा है।

इसी संदर्भ में Supreme Court stays exhumation in Chhattisgarh आदेश को राहत के रूप में देखा जा रहा है।


ग्राम पंचायतों की भूमिका पर भी सवाल

जनहित याचिका में यह भी मांग की गई है कि राज्य की सभी ग्राम पंचायतों को निर्देश दिया जाए कि वे गांवों में दफन के लिए अलग स्थान चिह्नित करें।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं होने के कारण विवाद की स्थिति बनती है।


होर्डिंग विवाद पर अलग फैसला

इससे पहले सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें कुछ ग्राम सभाओं द्वारा लगाए गए होर्डिंग्स को चुनौती दी गई थी। इन होर्डिंग्स में कथित रूप से ईसाई पादरियों और प्रचारकों के प्रवेश पर रोक की बात कही गई थी।

शीर्ष अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता राज्य के पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) नियम यानी PESA नियमों के तहत संबंधित प्राधिकरण के पास जा सकते हैं। हाईकोर्ट ने भी 28 अक्टूबर 2025 के अपने आदेश में यही स्वतंत्रता दी थी।


सामाजिक और संवैधानिक महत्व

Supreme Court stays exhumation in Chhattisgarh आदेश केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह संवैधानिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा अहम प्रश्न भी है।

ग्रामीण क्षेत्रों में जहां सामाजिक ताना-बाना नाजुक होता है, वहां ऐसे फैसलों का दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है। फिलहाल, अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक अंतिम निर्णय नहीं आता, तब तक किसी भी दफनाए गए शव को जबरन नहीं निकाला जाएगा।


अब राज्य सरकार को नोटिस का जवाब देना होगा। मामले की अगली सुनवाई में अदालत विस्तृत दिशा-निर्देश दे सकती है।

तब तक, Supreme Court stays exhumation in Chhattisgarh आदेश आदिवासी ईसाई समुदाय के लिए अंतरिम राहत के रूप में देखा जा रहा है।

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