105 दिन की देरी माफ नहीं, ‘अज्ञानता’ को नहीं माना पर्याप्त कारण

Chhattisgarh High Court maintenance case: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक अहम फैसले में 105 दिन की देरी से दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया।

अदालत ने स्पष्ट कहा कि “कानून की अज्ञानता” या “कानूनी जानकारी का अभाव” देरी माफ करने के लिए पर्याप्त कारण नहीं हो सकता।

यह फैसला न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा की एकलपीठ ने 12 फरवरी को सुनाया।


क्या था मामला?

मामला 5 जुलाई 2025 को पारित पारिवारिक न्यायालय के आदेश से जुड़ा था।

परिवार न्यायालय ने पत्नी की ओर से दायर आवेदन को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए उसे आवेदन की तिथि से प्रति माह 2,000 रुपये भरण-पोषण देने का आदेश दिया था।

पति ने इस आदेश को चुनौती देने के लिए हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की। हालांकि, यह याचिका निर्धारित समय सीमा से लगभग 105 दिन बाद दायर की गई।


याचिकाकर्ता की दलील

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता चंद्रिकादित्य पांडे ने तर्क दिया कि आवेदक एक ग्रामीण और अशिक्षित व्यक्ति है।

उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता को न्यायालयी प्रक्रियाओं की जानकारी नहीं थी और वह इस “सद्भावनापूर्ण विश्वास” में था कि स्थानीय वकील प्रतिकूल आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देंगे।

जनवरी में उसे पहली बार पता चला कि आदेश के खिलाफ कोई याचिका दायर नहीं की गई। इसके बाद उसने तुरंत कदम उठाया।

दलील दी गई कि 105 दिन की देरी न तो जानबूझकर थी और न ही दुर्भावनापूर्ण।


अदालत की सख्त टिप्पणी

Chhattisgarh High Court maintenance case में अदालत ने कहा:

“कानून की अज्ञानता अपने आप में पर्याप्त कारण नहीं है। देरी माफ करने की शक्ति सावधानीपूर्वक और संतोषजनक कारण के आधार पर ही प्रयोग की जानी चाहिए।”

अदालत ने यह भी कहा कि सीमा निर्धारण का सिद्धांत सार्वजनिक नीति पर आधारित है, जो मुकदमों में निश्चितता और अंतिमता सुनिश्चित करता है।

सर्वोच्च न्यायालय के रामकुमार चौधरी मामले के निर्णय का हवाला देते हुए कहा गया कि देरी माफ करने का विवेकाधिकार बहुत सावधानी से इस्तेमाल किया जाना चाहिए।


क्यों नहीं मिली राहत?

अदालत ने पाया कि—

  • याचिकाकर्ता ने समय सीमा के भीतर कोई ठोस कारण प्रस्तुत नहीं किया।
  • रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि वह लंबे समय तक निष्क्रिय रहा।
  • केवल सहानुभूति के आधार पर देरी को “पर्याप्त कारण” नहीं माना जा सकता।

इस प्रकार, Chhattisgarh High Court maintenance case में 105 दिन की देरी को माफ करने से इनकार कर दिया गया और पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गई।


फैसले का व्यापक महत्व

यह निर्णय बताता है कि अदालतें समय-सीमा के नियमों को गंभीरता से लेती हैं।

भले ही कोई व्यक्ति ग्रामीण या अशिक्षित हो, लेकिन उसे कानून द्वारा निर्धारित समय-सीमा का पालन करना आवश्यक है।

यह फैसला स्पष्ट संदेश देता है कि न्यायालय सहानुभूति के आधार पर प्रक्रिया संबंधी नियमों को नजरअंदाज नहीं कर सकता।


निष्कर्ष

Chhattisgarh High Court maintenance case में आया यह निर्णय सीमा कानून (Law of Limitation) की महत्ता को दोहराता है।

अदालत ने कहा कि एक बार वैधानिक अवधि समाप्त हो जाए, तो याचिकाकर्ता को पर्याप्त और संतोषजनक कारण दिखाना होगा।

साफ है कि न्यायालय ने कानून की निश्चितता और अंतिमता को प्राथमिकता दी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *