छत्तीसगढ़ में वन अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए अपनाई गई एक नई रणनीति ने कानूनी और नैतिक बहस को जन्म दे दिया है। Chhattisgarh Forest Department Controversy उस समय सामने आई, जब वन विभाग के उच्चस्तरीय बैठक के दस्तावेजों में ‘सामाजिक बहिष्कार’ को एक प्रमुख उपाय के रूप में अपनाने का निर्देश सामने आया।
यह निर्देश वन्यजीव अपराधों के खिलाफ सख्ती दिखाने के प्रयास का हिस्सा बताया जा रहा है।
क्या है पूरा मामला?
सूत्रों के अनुसार, प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) अरुण कुमार पांडेय द्वारा जारी निर्देश में अधिकारियों को पारंपरिक कानूनी कार्रवाई से आगे बढ़ते हुए सामाजिक स्तर पर भी दबाव बनाने को कहा गया है।
निर्देश के तहत:
- डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर्स (DFOs) को गांव के मुखियाओं, धार्मिक नेताओं और स्थानीय संगठनों से समन्वय करने को कहा गया है।
- वन अपराध में लिप्त पाए गए व्यक्तियों का सामाजिक बहिष्कार कराने की रणनीति सुझाई गई है।
- आरोपितों के नाम, फोटो और कथित साक्ष्य गांव के चौक-चौराहों पर सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने का प्रस्ताव है।
- संदिग्धों का विस्तृत डेटाबेस तैयार कर नियमित निगरानी रखने के निर्देश दिए गए हैं।
वन विभाग का तर्क है कि इससे शिकार और अवैध गतिविधियों पर रोक लगेगी और जंगलों की सुरक्षा मजबूत होगी।
मानवाधिकार और कानून विशेषज्ञों की आपत्ति
हालांकि, Chhattisgarh Forest Department Controversy ने मानवाधिकार और विधि विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है।
डॉ. दिनेश मिश्रा, जो सामाजिक बहिष्कार की प्रथा के खिलाफ अभियान चलाते रहे हैं, ने कहा कि किसी व्यक्ति को समाज से अलग कर देना “नागरिक मृत्यु” के समान है।
उनका कहना है कि दंड केवल कानून और न्यायालय के माध्यम से दिया जाना चाहिए, न कि सामाजिक दबाव या सार्वजनिक अपमान के जरिए।
आलोचकों का मानना है कि यह कदम संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों और विधिसम्मत प्रक्रिया के सिद्धांत के विपरीत हो सकता है।
मुख्यमंत्री को शिकायत
वन्यजीव प्रेमी नितिन सिंहवी ने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को औपचारिक शिकायत सौंपी है।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि वन विभाग जांच और प्रवर्तन की कमियों को छिपाने के लिए न्यायिक प्रक्रिया से बाहर के उपाय अपना रहा है।
इस बीच, वन एवं पर्यावरण मंत्री केदार कश्यप ने स्पष्ट समर्थन या विरोध जताने से परहेज किया। उन्होंने कहा कि निर्णय आमतौर पर जंगलों और वन्यजीवों की सुरक्षा तथा लोगों के हित को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं।
क्या है कानूनी चुनौती?
विशेषज्ञों के अनुसार, सामाजिक बहिष्कार जैसी कार्रवाई:
- विधिसम्मत प्रक्रिया को दरकिनार कर सकती है।
- निर्दोष व्यक्ति की प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुंचा सकती है।
- भीड़ आधारित दंड की मानसिकता को बढ़ावा दे सकती है।
इसी कारण Chhattisgarh Forest Department Controversy अब केवल वन संरक्षण तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह संवैधानिक मूल्यों और मानवाधिकारों से जुड़ा प्रश्न बन गई है।
निष्कर्ष
वन अपराधों पर सख्ती जरूरी है। जंगल और वन्यजीव संरक्षण राज्य की प्राथमिकता होनी चाहिए।
लेकिन, Chhattisgarh Forest Department Controversy यह भी याद दिलाती है कि कानून के शासन और मानवाधिकारों की रक्षा उतनी ही महत्वपूर्ण है।
अब देखना होगा कि सरकार इस विवाद पर क्या अंतिम रुख अपनाती है और क्या प्रस्तावित रणनीति में कोई संशोधन किया जाता है।
