नक्सल मुठभेड़ में शहीद CAF जवान की मां को पेंशन से वंचित करना ‘अत्यंत अन्यायपूर्ण’, 6 सप्ताह में निर्णय के निर्देश

Chhattisgarh High Court ने एक अहम और संवेदनशील मामले में टिप्पणी करते हुए कहा है कि नक्सल मुठभेड़ में शहीद हुए CAF जवान की मां को पेंशन से वंचित करना “अत्यंत अन्यायपूर्ण” है। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह छह सप्ताह के भीतर मामले पर निर्णय ले।

यह फैसला Chhattisgarh High Court pension to martyr mother मामले में आया है, जिसने प्रदेश में पेंशन नियमों को लेकर नई बहस छेड़ दी है।


2012 की मुठभेड़ में शहीद हुए थे इग्नेशियस लकड़ा

Ignatius Lakra, जो छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल (CAF) की 10वीं बटालियन में पुलिस कांस्टेबल थे, वर्ष 2012 में नक्सलियों के साथ मुठभेड़ में शहीद हो गए थे। उस समय उनकी उम्र महज 21 वर्ष थी।

उनके शहीद होने के बाद उनके माता-पिता — लोबिन लकड़ा और फिलिसिता लकड़ा — को पारिवारिक पेंशन मिलनी शुरू हुई। लेकिन अगस्त 2020 में पिता लोबिन लकड़ा के निधन के बाद पेंशन आनी बंद हो गई।

जशपुर जिला कोषालय से मिलने वाली यह पेंशन रुकने के बाद 68 वर्षीय फिलिसिता लकड़ा ने कई बार अधिकारियों से संपर्क किया, लेकिन समाधान नहीं मिला। अंततः 2021 में उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।


नियमों की व्याख्या पर विवाद

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता Ashish Beck ने तर्क दिया कि 1965 के नियम भेदभावपूर्ण हैं।

उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (असाधारण पेंशन) नियम 1963 में संशोधन के बाद यह स्पष्ट है कि यदि पिता को पेंशन मिल रही थी और उनका निधन हो जाए, तो वही पेंशन मां को दी जाएगी।

दूसरी ओर, राज्य की ओर से डिप्टी एडवोकेट जनरल प्रसून कुमार ने दलील दी कि 1965 के नियम विशेष श्रेणी के पुलिसकर्मियों पर लागू होते हैं और विशेष नियम सामान्य नियमों पर वरीयता रखते हैं।


हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

मामले की सुनवाई Ramesh Sinha और Ravindra Kumar Agrawal की खंडपीठ ने की।

कोर्ट ने कहा:

“पेंशन नियम 1963 में वर्ष 1970 में संशोधन कर यह प्रावधान जोड़ा गया था कि पिता को स्वीकृत पेंशन उनके निधन के बाद मां को दी जाएगी। यदि ऐसा ही संशोधन 1965 के नियमों में किया गया होता, तो याचिकाकर्ता पेंशन पाने की हकदार होती।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि 1965 के नियम 1963 के नियमों के अनुपालन में बनाए गए थे। इसलिए राज्य सरकार को समान संशोधन करना चाहिए था।

सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी में कोर्ट ने कहा:

“मृत कर्मचारी की मां को पेंशन से वंचित करना अत्यंत अन्यायपूर्ण है, विशेषकर जब उसका बेटा नक्सली हमले में शहीद हुआ हो।”


छह सप्ताह में निर्णय के निर्देश

अंत में कोर्ट ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता पेंशन की पात्र हैं और राज्य सरकार छह सप्ताह के भीतर मामले पर विचार कर निर्णय ले।

यह फैसला Chhattisgarh High Court pension to martyr mother केस में न केवल एक परिवार के लिए राहत है, बल्कि भविष्य में ऐसे मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण उदाहरण बनेगा।


भावनात्मक पहलू: एक मां की प्रतीक्षा

एक 21 वर्षीय बेटे ने देश की सुरक्षा में अपने प्राण न्योछावर कर दिए। वर्षों तक माता-पिता को पेंशन मिलती रही। लेकिन पति के निधन के बाद एक वृद्ध मां को न्याय के लिए अदालत की शरण लेनी पड़ी।

यह मामला केवल कानूनी नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना से भी जुड़ा है। हाईकोर्ट की यह टिप्पणी बताती है कि कानून का उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना है — खासकर उन परिवारों के लिए जिन्होंने देश के लिए बलिदान दिया है।


छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह निर्णय राज्य सरकार के लिए स्पष्ट संदेश है कि पेंशन नियमों में भेदभावपूर्ण प्रावधानों को सुधारा जाए। शहीद जवान की मां को सम्मान और अधिकार दोनों मिलना चाहिए।

अब सबकी नजर इस बात पर है कि राज्य सरकार छह सप्ताह के भीतर क्या निर्णय लेती है।

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