बिलासपुर। न्यायालय ने एक ऐसा फैसला सुनाया है, जिसने न केवल एक वृद्ध माँ को न्याय दिलाया, बल्कि शहीद परिवारों के अधिकारों को भी मजबूती दी। Chhattisgarh High Court Pension Order में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि देश के लिए प्राण न्यौछावर करने वाले शहीद की माँ को पेंशन से वंचित करना घोर अन्याय है।
मुख्य न्यायाधीश Ramesh Sinha और न्यायमूर्ति Ravindra Kumar Agrawal की खंडपीठ ने जशपुर जिले की 68 वर्षीय फिलिसिता लकड़ा की याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को छह सप्ताह के भीतर पेंशन और सभी बकाये का भुगतान करने का निर्देश दिया।
2002 के नक्सली हमले से जुड़ा है मामला
यह मामला वर्ष 2002 में नक्सली हमले में शहीद हुए 10वीं बटालियन के आरक्षक इग्नासियस लकड़ा से संबंधित है।
शहीद के पिता लोबिन लकड़ा को उनकी मृत्यु तक पेंशन मिलती रही। लेकिन वर्ष 2020 में उनके निधन के बाद प्रशासन ने शहीद की माँ को यह लाभ देने से इनकार कर दिया।
यहीं से शुरू हुआ चार साल लंबा संघर्ष, जो आखिरकार Chhattisgarh High Court Pension Order के जरिए न्याय में बदला।
नियमों की व्याख्या पर उठा विवाद
ट्रेजरी ऑफिसर ने 1965 के पुलिस नियमों का हवाला देते हुए कहा कि पिता की मृत्यु के बाद माँ को पेंशन हस्तांतरित करने का कोई प्रावधान नहीं है।
हालांकि, याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि 1963 के सिविल सेवा नियमों में स्पष्ट रूप से पिता के बाद माँ को पेंशन देने का प्रावधान है।
उन्होंने तर्क दिया कि पुलिसकर्मियों के परिवारों के साथ अलग व्यवहार करना असंवैधानिक और भेदभावपूर्ण है।
‘हार्मोनियस कंस्ट्रक्शन’ सिद्धांत अपनाया
Chhattisgarh High Court ने इस मामले में “हार्मोनियस कंस्ट्रक्शन” के सिद्धांत को अपनाया।
अदालत ने कहा कि जब दो नियमों में विरोधाभास प्रतीत हो, तो उन्हें इस प्रकार पढ़ा जाना चाहिए कि न्याय और समानता सुनिश्चित हो सके।
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि पुलिसकर्मी जोखिम भरे माहौल में काम करते हैं। ऐसे में उनके परिवारों को अन्य सरकारी कर्मचारियों की तुलना में कम लाभ देना न्यायसंगत नहीं है।
इसलिए 1963 के लाभकारी प्रावधानों को 1965 के पुलिस नियमों में भी पढ़ा जाना चाहिए।
छह सप्ताह में पेंशन और बकाया भुगतान का आदेश
अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि फिलिसिता लकड़ा को छह सप्ताह के भीतर पेंशन और चार वर्षों का समस्त बकाया भुगतान किया जाए।
यह Chhattisgarh High Court Pension Order न केवल एक परिवार के लिए राहत है, बल्कि भविष्य में ऐसे मामलों के लिए भी मार्गदर्शक सिद्ध होगा।
न्याय से भरा मानवीय संदेश
चार वर्षों तक एक माँ अपने शहीद बेटे के सम्मान और अधिकार के लिए दर-दर भटकती रही। अंततः न्यायपालिका ने यह स्पष्ट कर दिया कि शहीद के परिवार के साथ अन्याय बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
यह फैसला बताता है कि कानून केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और समानता का माध्यम भी है।
Chhattisgarh High Court Pension Order ने यह संदेश दिया है कि देश के लिए बलिदान देने वालों के परिवारों का सम्मान सर्वोपरि है — और उन्हें उनका हक हर हाल में मिलना चाहिए।
