90 की उम्र में भी हौसला कायम, चिकित्सा विज्ञान ने दिया नया जीवन
बिलासपुर।
SIMS Bilaspur Hip Fracture Treatment: 90 वर्षीय इंडिया बाई के साथ हुए सड़क हादसे ने उनके परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया था। हादसे के बाद उनकी हालत बेहद गंभीर थी और बायां कूल्हा बुरी तरह टूट चुका था। आमतौर पर इतनी अधिक उम्र में कूल्हे का फ्रैक्चर मरीज को महीनों तक बिस्तर से बांध देता है, लेकिन सिम्स बिलासपुर में हुआ इलाज उम्मीद से कहीं आगे निकल गया।
गंभीर हालत में सिम्स पहुंची थीं इंडिया बाई
परिजन उन्हें गंभीर अवस्था में सिम्स बिलासपुर के अस्थि रोग विभाग लेकर पहुंचे। यहां अस्थि रोग विशेषज्ञ डॉ. तरुण सिंह की निगरानी में तुरंत इलाज शुरू किया गया।
डॉक्टरों के अनुसार, 90 वर्ष की उम्र में—
- कूल्हे का फ्रैक्चर जुड़ना बेहद कठिन होता है
- लंबे समय तक बिस्तर पर रहने से संक्रमण, कमजोरी, फेफड़ों की बीमारी और अन्य जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है
ऐसे में हर कदम बेहद सावधानी से उठाना जरूरी था।
आधुनिक तकनीक और सही निर्णय बना सफलता की कुंजी
SIMS Bilaspur Hip Fracture Treatment के तहत डॉक्टरों ने आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों और सटीक सर्जिकल योजना के साथ इलाज किया।
सफल ऑपरेशन के बाद वह हुआ, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी।
👉 ऑपरेशन के अगले ही दिन इंडिया बाई अपने पैरों पर चलने लगीं।
यह न केवल परिजनों के लिए राहत की खबर थी, बल्कि अस्पताल के स्टाफ और अन्य मरीजों के लिए भी प्रेरणा बन गई।
डॉक्टरों के लिए भी रहा चुनौतीपूर्ण मामला
डॉ. तरुण सिंह ने बताया कि—
“इतनी अधिक उम्र में कूल्हे का फ्रैक्चर एक बड़ी चुनौती होता है। सही समय पर सर्जरी और बाद की देखभाल ने मरीज को जल्दी चलने में मदद की।”
उन्होंने कहा कि बुजुर्ग मरीजों में जल्दी मोबिलाइजेशन बेहद जरूरी होता है, ताकि अन्य बीमारियों से बचा जा सके।
परिजनों ने जताया आभार
इंडिया बाई के परिजनों ने सिम्स अस्पताल और डॉक्टरों की टीम का आभार व्यक्त किया।
उनका कहना है कि—
“हमें डर था कि मां शायद लंबे समय तक बिस्तर पर न रह जाएं, लेकिन डॉक्टरों ने हमारी उम्मीद से कहीं ज्यादा बेहतर परिणाम दिया।”
उम्र नहीं, सही इलाज मायने रखता है
इंडिया बाई की यह कहानी साबित करती है कि—
- उम्र इलाज में बाधा नहीं होती
- समय पर इलाज, अनुभवी डॉक्टर और आधुनिक तकनीक मिल जाए, तो असंभव भी संभव हो सकता है
सिम्स बिलासपुर का यह सफल इलाज न केवल चिकित्सा उपलब्धि है, बल्कि बुजुर्ग मरीजों और उनके परिवारों के लिए उम्मीद की किरण भी है।
