क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट भर्ती पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, चार महिलाओं की याचिका खारिज

क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट भर्ती विवाद पर हाईकोर्ट का स्पष्ट रुख

Clinical Psychologist Recruitment: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य में क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट भर्ती से जुड़े एक अहम मामले में चार महिलाओं की याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि भर्ती के लिए योग्यता निर्धारित करना राज्य का नीतिगत अधिकार है, और इसमें तब तक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता जब तक यह स्पष्ट रूप से मनमाना या कानून के विरुद्ध न हो।

यह फैसला न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने सुनाया।


क्या था पूरा मामला

याचिकाकर्ता महिलाएं स्वयं को योग्य और प्रैक्टिस कर रही क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट बता रही थीं। वे रीहैबिलिटेशन काउंसिल ऑफ इंडिया (RCI) में पंजीकृत थीं और उन्होंने RCI मान्यता प्राप्त संस्थानों से अपनी योग्यता प्राप्त की थी।

महिलाओं का दावा था कि वे—

  • मेंटल हेल्थकेयर एक्ट, 2017 की धारा 2(g) के तहत “क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट” की वैधानिक परिभाषा में आती हैं
  • RCI एक्ट, 1992 के तहत विधिसम्मत रूप से इस पेशे का अभ्यास कर रही हैं
  • केंद्र के कानूनों के अनुसार इस पद पर नियुक्ति की हकदार हैं

भर्ती विज्ञापन से क्यों था विरोध

छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (CGPSC) ने 22 अप्रैल 2025 को भर्ती विज्ञापन जारी किया था।
इसमें क्लॉज 2.C(iv)(क) के तहत योग्यता तय की गई—

क्लिनिकल साइकोलॉजी में पोस्ट ग्रेजुएशन या
राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) द्वारा मान्यता प्राप्त समकक्ष योग्यता

याचिकाकर्ताओं को आपत्ति थी कि NMC मान्यता प्राप्त योग्यता को शामिल करना—

  • मेंटल हेल्थकेयर एक्ट, 2017
  • RCI एक्ट, 1992

के वैधानिक ढांचे के खिलाफ है।


संशोधित नियमों को भी दी चुनौती

याचिका में—

  • 9 सितंबर 2024 की राजपत्र अधिसूचना
  • छत्तीसगढ़ मेडिकल एजुकेशन (राजपत्रित) सेवा नियम, 2013 के
    शेड्यूल-III की क्लॉज 17

को भी चुनौती दी गई।

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि इन प्रावधानों से RCI की वैधानिक भूमिका कमजोर होती है और इससे अनुपयुक्त व्यक्तियों को संवेदनशील मानसिक स्वास्थ्य पदों पर नियुक्ति का रास्ता खुलता है।


अनुच्छेद 14 और 21 के उल्लंघन का दावा

महिलाओं ने दलील दी कि—

  • ये नियम अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार)
  • और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार)

का उल्लंघन करते हैं।

उनका कहना था कि इससे न केवल RCI-पंजीकृत पेशेवरों के साथ भेदभाव होता है, बल्कि सार्वजनिक मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को भी गंभीर खतरा हो सकता है।


हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका

हाईकोर्ट ने कहा—

  • भर्ती विज्ञापन में योग्यता “OR” शब्द से स्पष्ट रूप से अलग-अलग विकल्पों में दी गई है
  • याचिकाकर्ताओं के पास क्लिनिकल साइकोलॉजी में मास्टर डिग्री है
  • इसलिए वे पहले ही पात्रता की मुख्य श्रेणी में आती हैं

कोर्ट के अनुसार—

“याचिकाकर्ताओं को कोई वास्तविक नुकसान नहीं हुआ है। यह विवाद केवल अकादमिक और काल्पनिक है।”


राज्य का नीतिगत अधिकार सर्वोपरि

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—

  • MHCA, 2017 और RCI एक्ट, 1992
    राज्य को भर्ती के लिए योग्यता तय करने से नहीं रोकते
  • अनुच्छेद 254 के तहत कानूनी टकराव (Repugnancy) का तर्क भी गलत है
  • भर्ती नियम न तो RCI-पंजीकृत पेशेवरों को बाहर करते हैं और न ही उनके अधिकार छीनते हैं

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला

हाईकोर्ट ने Tajvir Singh Sodhi बनाम जम्मू-कश्मीर राज्य मामले का हवाला देते हुए कहा—

“योग्यता निर्धारित करना नियोक्ता की नीति का विषय है। न्यायिक हस्तक्षेप केवल तब होगा, जब वह स्पष्ट रूप से मनमाना या कानून के विरुद्ध हो।”


कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता—

  • किसी भी प्रकार की मनमानी, अवैधता या संवैधानिक उल्लंघन को साबित नहीं कर सकीं
  • पूरी याचिका गलत कानूनी आधारों पर आधारित थी

👉 इसी के साथ याचिका को खारिज कर दिया गया।

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