राजिम | विशेष संवाददाता
Sant Kavi Pawan Diwan Punyatithi: छत्तीसगढ़ के गांधी कहे जाने वाले प्रख्यात संत कवि स्वामी अमृतानंद (पवन दीवान) की पुण्यतिथि आज श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई जाएगी। इस अवसर पर स्वामी अमृतानंद (पवन दीवान) स्मृति छत्तीसगढ़ ब्रह्मचर्य आश्रम न्यास समिति, राजिम द्वारा विशेष श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा।
आश्रम में अर्पित होंगे श्रद्धा सुमन
न्यास समिति के अध्यक्ष संतोष उपाध्याय, सचिव अनिल तिवारी, सहसचिव संदीप तिवारी सहित सदस्य राजेश्री महंत, डॉ. रामसुंदर दास, के.के. पुराणिक, लोकेश पांडे, युवराज शर्मा, के.के. शर्मा, विकास तिवारी और दिनेश शर्मा ने बताया कि आश्रम परिसर में संत कवि पवन दीवान को श्रद्धा सुमन अर्पित किए जाएंगे।
इसके साथ ही श्रद्धालुओं की उपस्थिति में स्मरण सभा आयोजित होगी, जहाँ उनके विचारों और योगदान को याद किया जाएगा।
चरण पादुका पूजन और मंत्रोच्चार
श्री राजीव लोचन मंदिर ट्रस्ट के मैनेजर पुरुषोत्तम मिश्रा ने बताया कि पुण्यतिथि के अवसर पर चरण पादुका पूजन किया जाएगा। साथ ही संस्कृत विद्यापीठ के विद्यार्थियों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार होगा। कार्यक्रम के समापन पर श्रद्धालुओं को भोजन प्रसादी भी प्रदान की जाएगी।
छत्तीसगढ़ के गांधी थे संत कवि पवन दीवान
संत कवि पवन दीवान केवल आध्यात्मिक व्यक्तित्व ही नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी अस्मिता के सशक्त स्वर थे। उन्हें “छत्तीसगढ़ का गांधी” कहा जाता है। वे छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल रहे और छत्तीसगढ़ी संस्कृति के मुखर पैरोकार थे।
उनकी प्रसिद्ध कृतियों में “अंबर का आशीष” जैसी रचनाएँ आज भी पाठकों को प्रेरित करती हैं।
राजनीति और आध्यात्म का अनोखा संगम
स्वामी अमृतानंद (पवन दीवान) ने अभिभाजित मध्यप्रदेश में जेल मंत्री के रूप में कार्य किया। वे महासमुंद लोकसभा क्षेत्र से दो बार सांसद भी रहे। इसके अलावा, डॉ. रमन सिंह सरकार के दौरान उन्होंने छत्तीसगढ़ गौ सेवा आयोग के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी भी निभाई।
श्रीमद् भागवत महापुराण की उनकी कथाओं को सुनने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु उमड़ पड़ते थे। सरल जीवन, ओजस्वी वाणी और करुण विचारों के कारण वे जन-जन के हृदय में बसते थे।
2016 में हुआ ब्रह्मलीन
लाखों लोगों के दिलों पर राज करने वाले संत कवि पवन दीवान 2 मार्च 2016 को ब्रह्मलीन हो गए, लेकिन उनके विचार, कृतियाँ और सामाजिक योगदान आज भी छत्तीसगढ़ की आत्मा में जीवित हैं।
