Raipur Sahitya Utsav 2026 Bharat Bodh:
पुरखौती मुक्तांगन में आयोजित तीन दिवसीय ‘रायपुर साहित्य उत्सव-2026’ में साहित्यप्रेमियों का उत्साह देखते ही बन रहा है। उत्सव के तीसरे और अंतिम दिन भी बड़ी संख्या में नागरिक, विद्यार्थी, शोधार्थी और साहित्यकार परिसर में उपस्थित रहे। सुबह से ही विभिन्न सत्रों और परिचर्चाओं में शामिल होने के लिए पंजीयन काउंटरों पर लंबी कतारें देखने को मिलीं।
अब तक हजारों लोगों का पंजीयन इस बात का प्रमाण है कि रायपुर साहित्य उत्सव 2026 ने प्रदेश में साहित्य और वैचारिक संवाद के प्रति नई चेतना जगाई है।
📚 साहित्य उत्सव बना विचार-विमर्श का केंद्र
पुरखौती मुक्तांगन में आयोजित इस साहित्य उत्सव में साहित्य, संस्कृति, कला, मीडिया, समाज और तकनीक जैसे विषयों पर केंद्रित सत्र हुए। देश-प्रदेश के प्रख्यात लेखकों और वक्ताओं ने अपनी उपस्थिति से उत्सव को वैचारिक रूप से समृद्ध किया।
यह आयोजन छत्तीसगढ़ की साहित्यिक और सांस्कृतिक धरोहर को नई दिशा देने का सशक्त प्रयास बनकर उभरा।
🇮🇳 ‘नवयुग में भारत बोध’ पर गंभीर परिचर्चा
रविवार को श्यामलाल चतुर्वेदी मंडप में “नवयुग में भारत बोध” विषय पर विशेष परिचर्चा आयोजित की गई, जो वरिष्ठ साहित्यकार मावली प्रसाद श्रीवास्तव को समर्पित रही।
कार्यक्रम के सूत्रधार श्री प्रभात मिश्रा रहे, जबकि डॉ. संजीव शर्मा और डॉ. संजय द्विवेदी मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित थे।
🎓 शिक्षा में भारत बोध की आवश्यकता: डॉ. संजीव शर्मा
डॉ. संजीव शर्मा ने कहा कि नई शिक्षा नीति में भारतीय दृष्टि को स्थान देना एक सकारात्मक कदम है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय संस्कृति केवल आत्मकल्याण तक सीमित नहीं, बल्कि विश्व कल्याण की भावना से जुड़ी है। विविधता में एकता ही भारत की मूल पहचान है।
उन्होंने प्राथमिक शिक्षा में भारत बोध से जुड़ी पाठ्यवस्तु में बदलाव की आवश्यकता बताते हुए कहा कि
“मुगल आक्रमण भौतिक थे, लेकिन अंग्रेजों का आक्रमण मानसिक था, जिससे पैदा हुई हीन भावना से बाहर निकलना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।”
उन्होंने यह भी कहा कि उच्च शिक्षा संस्थानों को केवल प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि भारतीय दृष्टिकोण के साथ विश्वस्तरीय शिक्षा देनी होगी।
🌏 भारतीयता ही राष्ट्रबोध का आधार: डॉ. संजय द्विवेदी
डॉ. संजय द्विवेदी ने कहा कि भारतीय भाषाओं में ज्ञान और विज्ञान दोनों समाहित हैं।
उन्होंने कहा कि भारत ने कभी अपने विचार थोपे नहीं, बल्कि विवेकानंद की तरह उन्हें दुनिया के सामने प्रस्तुत किया।
उन्होंने भारतीय पत्रकारिता पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि
“पश्चिमी मानकों पर आधारित पत्रकारिता भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं है।”
उनका कहना था कि “भारत को जानो, भारत को मानो” ही भारत बोध का मूल मंत्र है और इसके प्रसार में शिक्षकों तथा मीडिया की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
✨ शिक्षा से ही भारत बोध का सशक्त प्रसार
परिचर्चा में वक्ताओं ने एकमत से कहा कि शिक्षा ही भारत बोध को समाज में स्थायी रूप देने का सबसे सशक्त माध्यम है।
भारतीय संस्कृति, परंपरा और आत्मविश्वास के पुनर्स्थापन के बिना राष्ट्रबोध अधूरा है।
Raipur Sahitya Utsav 2026 Bharat Bodh केवल एक साहित्यिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय चेतना, शिक्षा और संस्कृति को नए संदर्भों में समझने का मंच बनकर सामने आया।
यह उत्सव साबित करता है कि साहित्य आज भी समाज को दिशा देने की क्षमता रखता है।
