Raipur Sahitya Utsav Vinod Kumar Shukla:
नवा रायपुर स्थित पुरखौती मुक्तांगन में जनसंपर्क विभाग द्वारा आयोजित रायपुर साहित्य उत्सव के पहले दिन हिंदी साहित्य के शीर्षस्थ रचनाकार स्वर्गीय विनोद कुमार शुक्ल और उनके साहित्य को भावपूर्ण स्मरण के साथ नमन किया गया।
‘स्मृति शेष स्वर्गीय विनोद कुमार शुक्ल: साहित्य की खिड़कियां’ विषय पर आयोजित परिचर्चा में साहित्य, प्रशासन, पत्रकारिता और फिल्म जगत से जुड़े वक्ताओं ने उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर आत्मीय संवाद किया। वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि विनोद कुमार शुक्ल का साहित्य मानवीय संवेदना, सरल भाषा और गहरी अनुभूति का अद्वितीय उदाहरण है।
✍️ छत्तीसगढ़ की साहित्यिक परंपरा को नई दिशा
परिचर्चा के प्रथम वक्ता, सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी एवं साहित्यकार डॉ. सुशील कुमार त्रिवेदी ने कहा कि वे वर्ष 1973 से विनोद कुमार शुक्ल से जुड़े रहे। उन्होंने छत्तीसगढ़ की साहित्यिक विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि इस अंचल ने पिछले 200 वर्षों में हिंदी साहित्य को बार-बार नई दिशा दी है।
ठाकुर जगमोहन सिंह से लेकर माधवराव सप्रे, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, मुकुटधर पांडेय और विनोद कुमार शुक्ल तक की परंपरा ने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है।
डॉ. त्रिवेदी ने कहा कि श्री शुक्ल ने किसी विचारधारा का अनुकरण नहीं किया। उनका लेखन पूरी तरह मौलिक था, जिसमें साधारण मनुष्य अपनी पूरी गरिमा और संवेदना के साथ उपस्थित होता है। उनके उपन्यासों में ‘घर’ सबसे सुंदर और मानवीय प्रतीक बनकर उभरता है।
📚 मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता साहित्य
नई दिल्ली की कथाकार एवं पत्रकार सुश्री आकांक्षा पारे ने कहा कि कई लोग विनोद कुमार शुक्ल की रचनाओं को दुरूह मान लेते हैं, लेकिन असल में यही रचनाएं पाठकों से गहरा आत्मीय संबंध बनाती हैं।
उन्होंने कहा कि श्री शुक्ल मनुष्यता के सच्चे पुजारी थे और उनका साहित्य मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का कार्य करता है।
🌱 सामान्य जीवन में खुश रहने की सीख
जनसंपर्क विभाग के उप संचालक एवं युवा साहित्यकार श्री सौरभ शर्मा ने कहा कि विनोद कुमार शुक्ल का साहित्य यह सिखाता है कि सामान्य जीवन जीते हुए भी मनुष्य कैसे खुश रह सकता है।
उन्होंने स्मृतियों को साझा करते हुए बताया कि श्री शुक्ल के साथ बिताया गया समय सुकून से भरा होता था। उनकी रचनाओं में ‘स्मृति’ का प्रयोग बहुत गहराई से हुआ है, जो पाठकों में कौतुक और जिज्ञासा जगाता है।
🌾 प्रतीकों में बसता जीवन
राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी एवं लेखक श्री अनुभव शर्मा ने कहा कि विनोद कुमार शुक्ल को पढ़ने के बाद उन्होंने उनके साहित्य को जिया है।
पेड़ों का हरहराना, चिड़ियों का चहचहाना जैसे छोटे-छोटे प्रतीक उनकी रचनाओं में जीवन के बड़े अर्थ खोलते हैं। उनकी कथाएं हमारी मिट्टी से उपजे शब्दों में अपनी बात कहती हैं और परत-दर-परत खुलती जाती हैं।
🎭 साहित्य से मिला जीवन का संबल
अभिनेत्री सुश्री टी.जे. भानु ने कहा कि साहित्य उन्हें बचपन से संबल देता रहा है।
उन्होंने बताया कि विनोद कुमार शुक्ल की कविताएं पढ़कर उन्हें ऐसा लगा, मानो उनकी अपनी अनकही बातें शब्दों में ढल गई हों। वे हर वर्ष 1 जनवरी को उनके जन्मदिन पर रायपुर आकर उनसे मिलती थीं। उनकी किताबों में जनमानस की सच्ची और आत्मीय अनुभूतियां हैं।
🌍 साहित्य की अनेक खिड़कियां
परिचर्चा की सूत्रधार डॉ. नीलम वर्मा ने समापन करते हुए कहा कि विनोद कुमार शुक्ल के साहित्य की एक नहीं, बल्कि अनेक खिड़कियां हैं।
उनका लेखन गहरी मानवीय करुणा से भरा हुआ है और वह किसी एक राज्य या देश तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को जोड़ने की क्षमता रखता है।
