भारत में रासायनिक उर्वरकों का संकट: मिट्टी, सेहत और अर्थव्यवस्था तीनों पर भारी पड़ती खेती

Chemical Fertilizer Crisis in India: भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहां आज भी आबादी का बड़ा हिस्सा सीधे खेती पर निर्भर है। बढ़ती जनसंख्या की खाद्य जरूरतों को पूरा करने के लिए पिछले कई दशकों से रासायनिक उर्वरकों का उपयोग लगातार बढ़ता गया। शुरुआती दौर में इन उर्वरकों ने उत्पादन बढ़ाया और देश को खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बनाया, लेकिन आज यही रसायन खेती के लिए सबसे बड़ा संकट बनते जा रहे हैं।


📊 उर्वरक खपत के चौंकाने वाले आंकड़े

Chemical Fertilizer Crisis in India की गंभीरता आंकड़ों से साफ झलकती है।
वर्ष 2018-19 में देश में लगभग 115 करोड़ बोरी उर्वरकों की खपत थी, जो 2024-25 में बढ़कर 150 करोड़ बोरी से अधिक हो गई।

यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि भारत की कुल आबादी लगभग 143 करोड़ है, जबकि उर्वरकों की खपत इससे भी आगे निकल चुकी है। यह असंतुलन बताता है कि खेती अब जरूरत से ज्यादा रसायनों पर निर्भर हो चुकी है, जो भविष्य की खाद्य सुरक्षा और टिकाऊ कृषि के लिए बड़ा खतरा है।


🧑‍⚕️ थाली तक पहुंचता जहर: सेहत और मिट्टी पर दोहरी मार

आज रासायनिक उर्वरकों का असर सीधे हमारी थाली तक पहुंच चुका है।
गेहूं, चावल, दालें, सब्जियां, फल ही नहीं, बल्कि दूध, दही और घी तक में रासायनिक अवशेष पाए जा रहे हैं। इसका नतीजा यह है कि देश में कैंसर, हृदय रोग, एलर्जी और मधुमेह जैसी बीमारियों के मामले लगातार बढ़ रहे हैं।

वहीं खेतों की हालत भी बदतर होती जा रही है। वैज्ञानिक सलाह के अनुसार उर्वरक जड़ों के पास सीमित मात्रा में डालने चाहिए, लेकिन हकीकत में इन्हें पूरे खेत में फैला दिया जाता है। इससे खरपतवार बढ़ते हैं और किसान मजबूरी में ज्यादा वीडिसाइड का उपयोग करते हैं।
परिणामस्वरूप, मिट्टी के लाभकारी सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं और जमीन धीरे-धीरे बंजर होने लगती है।


💰 अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ और काला बाज़ार

उर्वरक संकट सिर्फ खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था पर भी भारी पड़ रहा है।
भारत में हर साल लगभग ₹3 लाख करोड़ मूल्य के रासायनिक उर्वरकों की खपत होती है, जिसमें सब्सिडी भी शामिल है। हैरानी की बात यह है कि उर्वरक उद्योग लगभग 80% तक आयात पर निर्भर है।

करीब ₹2.5 लाख करोड़ की राशि हर साल विदेशों में चली जाती है, जबकि देश की मिट्टी लगातार कमजोर होती जा रही है।


🏛️ सब्सिडी, सस्ता यूरिया और दुरुपयोग

पिछले 10 वर्षों में केंद्र सरकार ने ₹13 लाख करोड़ से अधिक की उर्वरक सब्सिडी दी है।
यूरिया, जिसकी वास्तविक कीमत करीब ₹40 प्रति किलो है, किसानों को ₹6 से भी कम में मिल जाता है। आज स्थिति यह है कि यूरिया चाय के कप से भी सस्ता हो गया है।

इस सस्ती कीमत ने काला बाज़ारी और दुरुपयोग को बढ़ावा दिया है। सब्सिडी वाला यूरिया खेती के बजाय प्लाइवुड फैक्ट्रियों, पशु आहार और मिलावटी दूध बनाने में इस्तेमाल किया जा रहा है।


🌱 समाधान की राह: प्रकृति की ओर लौटना जरूरी

इस गहराते संकट से बाहर निकलने के लिए अब ठोस और व्यावहारिक सुधार जरूरी हैं।
पहले किसान फसल अवशेषों को खाद के रूप में खेत में लौटाते थे, जिससे मिट्टी की जैविक शक्ति बनी रहती थी। आज थोड़े से पैसों के लिए अवशेष बेच दिए जाते हैं, लेकिन इसका खामियाजा महंगे उर्वरकों और खराब मिट्टी के रूप में चुकाना पड़ता है।


✅ मिट्टी को बचाने के लिए जरूरी सुझाव

  • हरी खाद का अधिक उपयोग: जैसे योग शरीर को स्वस्थ रखता है, वैसे ही हरी खाद मिट्टी को जीवंत बनाती है।
  • फसल चक्र अपनाएं: एक ही फसल बार-बार न उगाएं। दलहनी फसलें गहराई से पोषक तत्व लाती हैं।
  • सिंचाई के आधुनिक तरीके: ड्रिप सिंचाई से पानी और उर्वरक दोनों की बचत होती है।
  • यूरिया का सही समय: शाम के समय छिड़काव करने से कम मात्रा में बेहतर असर मिलता है।
  • पशुपालन को बढ़ावा: गोबर खाद से मिट्टी को दीर्घकालीन ताकत मिलती है।

यदि आज हमने अपनी मिट्टी को नहीं बचाया, तो कल हमारा भविष्य सुरक्षित नहीं रहेगा।
Chemical Fertilizer Crisis in India हमें चेतावनी दे रहा है कि अब रसायनों पर निर्भर खेती से बाहर निकलना ही होगा। सतत और प्राकृतिक कृषि कोई विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है — किसानों, उपभोक्ताओं और देश तीनों के लिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *