Bilaspur High Court Paternity Verdict: बिलासपुर हाई कोर्ट ने पितृत्व निर्धारण और संपत्ति अधिकार से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट कर दिया है कि यदि महिला का पहला विवाह कानूनी रूप से समाप्त नहीं हुआ है, तो उस अवधि में जन्मे बच्चों की कानूनी पहचान पहले पति से ही जुड़ी रहेगी। भले ही महिला किसी अन्य पुरुष के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रही हो और वह व्यक्ति बच्चों को अपनी संतान मानता हो।
यह फैसला पारिवारिक कानून और संपत्ति विवादों के मामलों में दूरगामी प्रभाव डालने वाला माना जा रहा है।
⚖️ डिवीजन बेंच का स्पष्ट और सख्त रुख
इस मामले की सुनवाई जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस ए.के. प्रसाद की डिवीजन बेंच ने की। अदालत ने साफ शब्दों में कहा—
“जब तक महिला का पहला विवाह विधिवत रूप से समाप्त नहीं होता, उस दौरान जन्मे बच्चों को पहले पति की ही संतान माना जाएगा।”
हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि लिव-इन रिलेशनशिप या मौखिक स्वीकारोक्ति पितृत्व निर्धारण का आधार नहीं बन सकती।
🏠 संपत्ति विवाद से जुड़ा था पूरा मामला
मामला तब सामने आया जब दो महिलाओं ने खुद को बिलासपुर के एक प्रतिष्ठित कारोबारी की बेटियां बताते हुए फैमली कोर्ट में याचिका दायर की। उन्होंने कारोबारी की संपत्ति में अधिकार पाने के लिए स्वयं को उसकी वैध संतान घोषित करने की मांग की थी।
👩 मां के विवाह को लेकर दिए गए तर्क
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि—
- उनकी मां ने वर्ष 1971 में कारोबारी के साथ वरमाला विवाह किया था
- उसी संबंध से उनका जन्म हुआ
- मां का पहला पति 1984 में घर छोड़कर चला गया था और फिर कभी वापस नहीं आया
इन तथ्यों के आधार पर उन्होंने खुद को कारोबारी की वैध संतान बताया।
🏛️ फैमली कोर्ट का फैसला
फैमली कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि—
- पहले पति की मृत्यु या तलाक का कोई वैधानिक प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया
- पहला विवाह कानूनी रूप से समाप्त नहीं हुआ था
अदालत ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5 और 11 के अनुसार पहला विवाह जीवित रहते दूसरा विवाह शून्य (Void Marriage) माना जाएगा।
❌ हाई कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका
हाई कोर्ट ने फैमली कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि—
- आधार कार्ड सहित सरकारी दस्तावेजों में बच्चों के पिता के रूप में पहले पति का नाम दर्ज है
- दस्तावेजी साक्ष्य पितृत्व निर्धारण में निर्णायक होते हैं
- ऐसे में याचिकाकर्ताओं को कारोबारी की वैध संतान नहीं माना जा सकता
इसी आधार पर हाई कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।
📌 क्यों यह फैसला महत्वपूर्ण है
- पितृत्व निर्धारण पर कानूनी स्पष्टता
- संपत्ति विवादों में गलत दावों पर रोक
- हिंदू विवाह अधिनियम की व्याख्या मजबूत
- लिव-इन संबंधों की कानूनी सीमाएं स्पष्ट
यह फैसला साफ संदेश देता है कि कानून में भावनाओं से ज्यादा महत्व वैधानिक स्थिति और दस्तावेजों को दिया जाएगा।
