क्या कानून सबके लिए एक जैसा है?
आज एक बार फिर Indian Law पर सवाल हो रहा है। सवाल आम नागरिकों के मन में है—
क्या भारत में कानून ताकत और पहचान के हिसाब से बदल जाता है?
एक तरफ 17 वर्षीय नाबालिग से रेप के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को जमानत मिलती है,
तो दूसरी तरफ लद्दाख के वैज्ञानिक और शिक्षाविद सोनम वांगचुक, जिन्होंने देश को नई दिशा दी, उन्हें राहत नहीं मिलती।
कुलदीप सिंह सेंगर को क्यों मिली जमानत?
दिल्ली हाईकोर्ट ने 2017 के उन्नाव रेप केस में दोषी करार दिए गए और उम्रकैद की सजा काट रहे पूर्व भाजपा नेता कुलदीप सिंह सेंगर की सजा को अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया।
कोर्ट की शर्तें:
- 15 लाख रुपये का निजी मुचलका
- दिल्ली में ही रहने की बाध्यता
- सप्ताह में एक बार पुलिस रिपोर्टिंग
- पासपोर्ट जमा करना
- पीड़िता के घर से 5 किमी दूर रहने का आदेश
अदालत ने साफ कहा कि किसी भी शर्त के उल्लंघन पर जमानत तुरंत रद्द कर दी जाएगी।
यह राहत सजा पर स्थगन के रूप में दी गई है, जब तक उनकी अपील लंबित है।
सोनम वांगचुक: जिसने देश को दिया भविष्य, उसे क्यों नहीं राहत?
वहीं दूसरी ओर, सोनम वांगचुक—
लद्दाख के वह वैज्ञानिक, शिक्षक और समाज सुधारक—
- जिन्होंने SECMOL की स्थापना कर शिक्षा सुधार किया
- मैट्रिक पास दर 5% से बढ़ाकर 75% की
- Ice Stupa Project से पानी संकट का समाधान निकाला
- Ramon Magsaysay Award (2018) जीता
- Rolex Award, Global Sustainable Architecture Award प्राप्त किया
आज वही व्यक्ति लद्दाख के अधिकारों की मांग करने पर हिरासत में है।
आंदोलन बना वजह
सोनम वांगचुक ने—
- New Ladakh Movement का नेतृत्व किया
- छठी अनुसूची, पर्यावरण संरक्षण और राज्यhood की मांग की
- 2024–25 में शांतिपूर्ण भूख हड़ताल की
उनकी गिरफ्तारी हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद हुई, और मामला अब सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।
जनता का सवाल: अपराध और आंदोलन में फर्क क्यों नहीं?
यहां Indian Law पर सवाल होना स्वाभाविक है—
- रेप जैसे जघन्य अपराध में दोषी नेता को राहत
- शांतिपूर्ण आंदोलन करने वाले वैज्ञानिक को जेल
क्या कानून अपराध की गंभीरता नहीं, बल्कि व्यक्ति की राजनीतिक पहचान देखता है?
कानून क्या कहता है?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार—
- जमानत और सजा निलंबन न्यायिक विवेक पर निर्भर करता है
- लेकिन न्याय की धारणा जनता के विश्वास से जुड़ी होती है
जब फैसले असमान दिखते हैं, तो न्याय व्यवस्था पर सवाल उठते हैं।
भरोसे की कसौटी पर न्याय
भारत का संविधान कहता है—
“कानून के सामने सभी समान हैं।”
लेकिन ऐसे मामलों में जनता पूछ रही है—
क्या यह समानता कागजों तक सीमित रह गई है?
