दंतेवाड़ा।
Abujhmad stone skin disease: कल्पना कीजिए, अगर आपकी त्वचा धीरे-धीरे पत्थर जैसी सख्त हो जाए और उठना-बैठना, चलना-फिरना हर दिन की सजा बन जाए। छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ से सामने आई एक तस्वीर और कहानी कुछ ऐसी ही है, जिसे देखकर दिल सिहर उठता है।
दंतेवाड़ा जिले के सुदूर आदिवासी अंचल अबूझमाड़ की रहने वाली 14 वर्षीय राजेश्वरी आज एक ऐसी दुर्लभ बीमारी से जूझ रही है, जिसने उसके कोमल शरीर को सूखी छाल और खुरदरे पत्थर में बदल दिया है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में उसकी बेबसी और दर्द साफ झलकता है।
⏳ 4 साल की उम्र से शुरू हुआ दर्द का यह सफर
राजेश्वरी के परिजनों के अनुसार, यह बीमारी तब सामने आई जब वह महज 4 साल की थी। शुरुआत में शरीर पर छोटे-छोटे फफोले दिखे, जिन्हें सामान्य एलर्जी समझकर नजरअंदाज कर दिया गया।
लेकिन समय के साथ स्थिति भयावह होती चली गई।
आज हालात यह हैं कि—
- राजेश्वरी के हाथ-पैर पूरी तरह सख्त हो चुके हैं
- त्वचा पर गहरी दरारें पड़ गई हैं, जिससे चलना-फिरना बेहद दर्दनाक है
- शरीर पर केराटिन की मोटी परत जम गई है, जो ढाल जैसी महसूस होती है
🧬 क्या है यह दुर्लभ बीमारी? (Ichthyosis Hystrix)
डॉक्टरों के अनुसार, राजेश्वरी इचथियोसिस हिस्ट्रिक्स (Ichthyosis Hystrix) नामक अत्यंत दुर्लभ जेनेटिक स्किन डिज़ीज से पीड़ित है। यह बीमारी दुनिया में बहुत कम लोगों को होती है।
इसके प्रमुख लक्षण—
- पत्थर जैसी सख्त त्वचा, केराटिन के अत्यधिक जमाव के कारण
- त्वचा पर कांटेदार या सींग जैसे उभार, जो तेज दर्द देते हैं
- बचपन या जन्म से शुरुआत
- त्वचा फटने, खुजली और संक्रमण का लगातार खतरा
यह मामला पहली बार 2020 में सामने आया था, लेकिन अफसोस की बात यह है कि इतने साल बीत जाने के बाद भी राजेश्वरी की हालत में कोई खास सुधार नहीं हुआ है।

🏥 अबूझमाड़ में इलाज बना सबसे बड़ी चुनौती
अबूझमाड़ जैसे दुर्गम आदिवासी इलाके में विशेषज्ञ डॉक्टरों, आधुनिक दवाओं और नियमित इलाज की भारी कमी है।
परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर है और बड़े शहरों तक इलाज कराना उनके लिए लगभग नामुमकिन हो गया है।
🙏 सीएम विष्णुदेव साय से मदद की आस
राजेश्वरी के माता-पिता अब पूरी तरह टूट चुके हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से भावुक अपील की है कि उनकी बेटी को बेहतर इलाज और विशेष मेडिकल सहायता दी जाए।
सोशल मीडिया पर भी लोग सरकार से मांग कर रहे हैं कि—
“इस ‘पत्थर बनती बेटी’ को जीने का हक और एक सामान्य बचपन दिया जाए।”
❓ बड़ा सवाल: क्या दुर्लभ बीमारियों के लिए विशेष फंड नहीं?
यह मामला कई सवाल खड़े करता है—
- क्या आधुनिक चिकित्सा के दौर में भी अबूझमाड़ तक मदद पहुंचने में इतनी देरी जायज है?
- क्या दुर्लभ बीमारियों के लिए अलग से विशेष फंड नहीं होना चाहिए?
- क्या राजेश्वरी को वह बचपन मिल पाएगा, जिसकी वह हकदार है?
आज राजेश्वरी सिर्फ एक बच्ची नहीं, बल्कि सिस्टम के सामने खड़ा एक कठोर सवाल बन चुकी है।
