नई दिल्ली Jharkhand Chhattisgarh lag behind Uttarakhand। नवंबर को भारत का “मदर मंथ” कहना अतिशयोक्ति नहीं है। इसी महीने देश के 14 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों का गठन या पुनर्गठन हुआ था। इनमें उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे तीन नए राज्य भी शामिल हैं, जो अब अपने गठन के 25 वर्ष पूरे कर चुके हैं।
लेकिन जब सिल्वर जुबली का जश्न मन रहा है, तब एक गंभीर प्रश्न भी उठ रहा है—Jharkhand Chhattisgarh lag behind Uttarakhand क्यों?
इन 25 वर्षों में तीनों राज्यों ने महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल की हैं, विशेषकर उत्तराखंड ने। फिर भी दो राज्य—झारखंड और छत्तीसगढ़—अपने प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद विकास की दौड़ में पीछे रह गए हैं।
तीन राज्य, तीन अलग दिशाएँ—अर्थव्यवस्था की तस्वीर क्या कहती है?
तीनों राज्यों के निर्माण के पीछे एक समान कारण था—आर्थिक और सांस्कृतिक पहचान को मजबूती देना।
परन्तु 25 वर्षों बाद आँकड़े एक अलग कहानी बताते हैं:
- उत्तराखंड प्रति व्यक्ति आय: ₹2.65 लाख
- छत्तीसगढ़ प्रति व्यक्ति आय: ₹1.45 लाख
- झारखंड प्रति व्यक्ति आय: ₹95,000
आर्थिक वृद्धि के आंकड़े भी यही अंतर दिखाते हैं—उत्तराखंड 8.2% की GDP वृद्धि के साथ आगे है, जबकि झारखंड 6.8% पर सिमटा है।
स्पष्ट है कि Jharkhand Chhattisgarh lag behind Uttarakhand केवल संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि नीति, प्रशासन और स्थिरता का परिणाम है।
खनिजों से भरपूर लेकिन विकास में पिछड़ क्यों?
झारखंड और छत्तीसगढ़ दोनों खनिज संपदा से समृद्ध हैं:
- झारखंड—भारत के 40% कोयले और 25% लौह-अयस्क का खजाना
- छत्तीसगढ़—लौह, बॉक्साइट और कोयले का प्रमुख केंद्र
2023 में खनिज राजस्व भी उल्लेखनीय रहा—
- झारखंड: ₹28,000 करोड़
- छत्तीसगढ़: ₹22,000 करोड़
- उत्तराखंड: hydropower से केवल ₹1,200 करोड़
फिर भी खनिज-समृद्ध राज्य गरीब क्यों?
क्योंकि खनिजों का लाभ स्थानीय लोगों तक नहीं पहुँच सका। बुनियादी ढाँचे, शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए राजस्व का उपयोग पर्याप्त नहीं हुआ।
राजनीतिक स्थिरता: उत्तराखंड आगे, झारखंड पीछे
झारखंड की बड़ी समस्या राजनीतिक अस्थिरता रही।
24 वर्षों में 11 मुख्यमंत्री और 3 बार राष्ट्रपति शासन ने विकास को धीमा कर दिया।
भ्रष्टाचार ने हालात और बिगाड़े—मधु कोड़ा, शिबू सोरेन और हेमंत सोरेन तक जेल पहुँच चुके हैं।
इसके विपरीत, उत्तराखंड को शुरुआती वर्षों में N.D. तिवारी जैसा अनुभवी नेतृत्व मिला, जिसने प्रशासनिक ढाँचा मजबूत किया।
छत्तीसगढ़ अपेक्षाकृत स्थिर रहा है—अब तक केवल 5 मुख्यमंत्री।
नक्सलवाद: विकास की राह का सबसे बड़ा अवरोध
- झारखंड: 18 जिले प्रभावित
- छत्तीसगढ़: 10 जिले लंबे समय तक प्रभावित
- विस्थापन — झारखंड में 25 लाख, छत्तीसगढ़ में 18 लाख लोग प्रभावित
सुरक्षा चिंताओं ने निवेश, उद्योग और पर्यटन को रोक दिया।
उधर उत्तराखंड में न नक्सलवाद है और न ही बड़े सामाजिक संघर्ष—निवेशकों का भरोसा स्वाभाविक रूप से वहीं बढ़ा।
उत्तराखंड का मॉडल: पर्यटन + सेवाएँ + स्थिर शासन
उत्तराखंड ने कम संसाधनों के बावजूद तीन स्तंभों पर विकास खड़ा किया:
- पर्यटन—चारधाम, एडवेंचर टूरिज्म, वेलनेस टूरिज्म
- हाइड्रोपावर—राज्य की ऊर्जा आवश्यकता पूरी, अतिरिक्त आय भी
- सेवा क्षेत्र—शिक्षा, IT, स्वास्थ्य में निवेश
यही कारण है कि Jharkhand Chhattisgarh lag behind Uttarakhand आज एक निर्विवाद सत्य है।
फिर भी उत्तराखंड की चुनौतियाँ कम नहीं
- पहाड़ी जिलों का पलायन—1500 गाँव खाली
- आपदाएँ—2013 केदारनाथ त्रासदी से 2023 जोशीमठ धँसाव तक
- लोकायुक्त न होने से भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं
- मैदान और पहाड़ में भारी विकास असमानता
आगे का रास्ता—क्या करें तीनों राज्य?
झारखंड के लिए
- खनिज राजस्व का बड़ा हिस्सा जनजातीय कल्याण कोष में जाए
- PESA Act को ईमानदारी से लागू किया जाए
- 50% स्थानीय रोजगार को अनिवार्य किया जाए
छत्तीसगढ़ के लिए
- “छत्तीसगढ़ मॉडल” को और मजबूत किया जाए
- जैविक खेती को वैश्विक ब्रांड बनाया जाए
- नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता
उत्तराखंड के लिए
- लोकायुक्त लागू कर भ्रष्टाचार पर नियंत्रण
- आपदा प्रबंधन को तकनीक आधारित बनाना
- पहाड़ी जिलों में रोजगार आधारित अर्थव्यवस्था विकसित करना
यह 25 वर्ष हमें बताते हैं कि केवल संसाधन विकास की गारंटी नहीं होते।
नीति, स्थिरता, सुरक्षा और प्रशासन—ये चार स्तंभ यह तय करते हैं कि कौन आगे बढ़ेगा और कौन पीछे रह जाएगा।
आज भी सबसे बड़ा सवाल वही है—
प्राकृतिक संपदा से भरपूर होने के बावजूद Jharkhand Chhattisgarh lag behind Uttarakhand क्यों?
इसका उत्तर व्यवस्था में है, जमीन में नहीं।
