बेंगलुरु में उत्तराहल्ली की रहने वाली बी.सी. गायत्री (57) के लिए पिछले एक साल से चल रही लड़ाई आखिरकार जीत में बदल गई। साइबर धोखाधड़ी में अपनी जमा पूंजी गंवाने के बाद गायत्री ने Canara Bank से न्याय की उम्मीद की थी, जो अब पूरी हो गई है। बेंगलुरु अर्बन I अतिरिक्त जिला उपभोक्ता आयोग ने बैंक को स्पष्ट शब्दों में “सेवा में कमी” (Deficiency in Service) का दोषी ठहराते हुए पूरा पैसा लौटाने का आदेश दिया है।
कैसे हुआ धोखाधड़ी का मामला?
यह मामला 4 मई 2024 को शुरू हुआ, जब कुछ अज्ञात साइबर अपराधियों ने गायत्री के खाते से चार ट्रांजैक्शन में ₹1,75,000 निकाल लिए।
गायत्री ने बताया कि
- उनके पास ना इंटरनेट बैंकिंग थी,
- ना मोबाइल बैंकिंग,
- और ना ही कोई UPI ऐप (Google Pay, PhonePe, Paytm)।
वह केवल अपनी डेबिट कार्ड सुविधा का उपयोग करती थीं। पैसे निकलने का पता चलते ही उन्होंने तुरंत बैंक को सूचना दी और 6 मई 2024 को पुलिस में FIR दर्ज कराई।
बैंक का तर्क— “ट्रांजैक्शन आपके मोबाइल से हुआ”
बैंक ने उपभोक्ता आयोग में दावा किया कि—
- लेनदेन रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर से हुए,
- MPIN/UPIN और OTP का इस्तेमाल हुआ,
- और इसलिए ये ट्रांजैक्शन खुद ग्राहक द्वारा अनुमोदित थे।
बैंक ने कहा कि बिना ग्राहक की अनुमति मोबाइल बैंकिंग या UPI सक्रिय ही नहीं हो सकता।
आयोग ने कहा— “ग्राहक की कोई गलती नहीं, तकनीक होते हुए भी बैंक असफल रहा”
सुनवाई के दौरान आयोग ने पाया कि—
- गायत्री के पास कोई डिजिटल पेमेंट सुविधा थी ही नहीं।
- बैंक ने इन बयानों का स्पष्ट खंडन नहीं किया।
- सभी ट्रांजैक्शन अनधिकृत थे।
आयोग ने कहा—
“ग्राहक बिना किसी लापरवाही के नुकसान उठा रही है। आधुनिक तकनीक के बावजूद बैंक धोखाधड़ी रोकने में विफल रहा। यह सेवा में गंभीर कमी है।”
बैंक को लौटाने होंगे पैसे और ब्याज
11 अगस्त 2025 को दिए गए आदेश में आयोग ने निर्देश दिया कि Canara Bank—
- ₹1,75,000
- 6.5% ब्याज (शिकायत दर्ज होने की तारीख से)
- ₹2,000 कानूनी खर्च
अदायगी करे।
गायत्री के लिए यह निर्णय न सिर्फ आर्थिक राहत है, बल्कि आम उपभोक्ताओं के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश है कि अगर बैंक लापरवाह हो, तो जिम्मेदारी तय की जा सकती है।
