बिहार में SIR प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: चुनाव आयोग से प्रक्रिया के औचित्य पर स्पष्टीकरण की मांग

नई दिल्ली। बिहार में मतदाता सूची की Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया को लेकर जारी विवाद गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सुर्या कांत और न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट कहा कि यदि यह सिर्फ सामान्य अपडेट नहीं है, बल्कि एक विशेष संशोधन है, तो इसकी प्रक्रिया को उचित ठहराना अनिवार्य है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं, जिन्होंने पूरे मामले को नई दिशा दे दी।
वहीं याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि ECI बिना कानूनी आधार के “विशेष संशोधन” जैसा भारी और संवेदनशील कदम नहीं उठा सकता।


ECI के अधिकार बनाम संवैधानिक सीमाएँ

वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने पीठ के सामने कहा कि SIR प्रक्रिया के लिए आवश्यक नियम या delegated legislation मौजूद नहीं हैं।
उन्होंने तर्क दिया:

“यह व्यापक पैमाने पर किया जा रहा अभ्यास है, जो केवल धारा 324 के सहारे नहीं हो सकता। चुनाव आयोग कानून नहीं बना सकता।”

इस पर CJI ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा—

“यदि आपके अनुसार ECI को SIR का अधिकार ही नहीं है, तो विशेष संशोधन कभी हो ही नहीं पाएगा। हालांकि, यदि यह विशेष प्रक्रिया है, तो इसे उचित ठहराया जाना चाहिए।”


BLO के अधिकारों पर सवाल

सुनवाई में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल भी शामिल हुए।
उन्होंने पूछा कि क्या एक साधारण बूथ लेवल अफसर (BLO) यह तय कर सकता है कि कोई व्यक्ति “अस्वस्थ मानसिक स्थिति” में है या नहीं?

सिब्बल ने कहा—

“यह अधिकार न शिक्षक के पास है, न BLO के पास। RP Act के तहत ऐसी घोषणा अदालत ही कर सकती है।”

उनका कहना था कि ऐसा कदम संविधान और कानून दोनों के खिलाफ है।


ECI की प्रक्रिया पर ‘अल्ट्रा वायर्स’ का सवाल

न्यायमूर्ति बागची ने साफ किया कि अदालत को यह देखना होगा कि—

“क्या यह नोटिस और प्रक्रिया, RP Act और उससे संबंधित कानूनों के अनुरूप है या फिर यह अधिकार-सीमा से बाहर (ultra vires) है?”

सिंघवी ने दलील दी कि ECI प्रक्रियागत बदलाव के नाम पर मूलभूत परिवर्तन नहीं कर सकता।

उन्होंने कहा—

“हमने कभी ऐसा नियम नहीं देखा कि पहले फॉर्म भरो, तभी आप सूची में बने रहेंगे या हटाए जाएंगे। यह मूलभूत परिवर्तन है।”


ECI के तर्क पर कोर्ट की प्रतिक्रिया

जब याचिकाकर्ताओं ने कहा कि कई लोगों के नाम 2003 की मतदाता सूची में नहीं थे, तो CJI ने व्यावहारिक टिप्पणी की—

“यदि नाम पहले ही सूची में नहीं था और आपने इसे सही कराने की कोशिश भी नहीं की, तो हो सकता है आप यह मौका खो चुके हों।”


राज्यों में SIR का विस्तार और विवाद

जून 2025 में ECI ने पहले बिहार में SIR शुरू किया, लेकिन इसके खिलाफ कई याचिकाएँ दाखिल हो गईं।
इसके बावजूद आयोग ने 27 अक्टूबर को SIR को तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, और केरल सहित कई राज्यों में लागू कर दिया।

इसके बाद तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में भी SIR को चुनौती दी गई।
11 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं पर नोटिस जारी किया।
उधर, केरल सरकार ने भी स्थानीय चुनाव पूरे होने तक SIR स्थगित करने की मांग की।


अगली सुनवाई की तारीखें

  • केरल SIR पर सुनवाई: 2 दिसंबर
  • तमिलनाडु SIR पर सुनवाई: 4 दिसंबर
  • पश्चिम बंगाल SIR पर सुनवाई: 9 दिसंबर

सुनवाई समाप्त करते हुए CJI ने कहा—

“हम इस मुद्दे को स्वतंत्र रूप से समझेंगे, बिना इसके कि चुनाव आयोग ने पहले क्या किया था।”