छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बिलासपुर सरकारी भवन में लिफ्ट खराबी पर लिया स्वतः संज्ञान, दिव्यांग कर्मचारियों की पहुंच पर जताई चिंता

रायपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बिलासपुर स्थित संयुक्त सरकारी भवन में महीनों से बंद पड़ी लिफ्ट और बुनियादी सुविधाओं की कमी पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने इस मामले में स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognisance) लेते हुए कहा कि यह न केवल प्रशासनिक लापरवाही का मामला है, बल्कि दिव्यांग कर्मचारियों के अधिकारों का उल्लंघन भी है।


⚖️ हाईकोर्ट ने कहा – “यह जनहित का गंभीर मामला है”

10 नवंबर को मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि बिलासपुर के इस भवन में चार दिव्यांग कर्मचारी प्रतिदिन सीढ़ियां चढ़ने को मजबूर हैं। अदालत ने इसे “जनहित का गंभीर मुद्दा” बताते हुए लोक निर्माण विभाग (PWD) के सचिव को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने के आदेश दिए।

हलफनामे में सचिव को यह बताना होगा कि –

  • मौजूदा लिफ्ट की मरम्मत में देरी का कारण क्या है?
  • नई लिफ्ट का संचालन कब शुरू होगा?
  • दिव्यांगों और आम नागरिकों की सुविधा के लिए क्या वैकल्पिक इंतजाम किए जा रहे हैं?

🏢 छह महीने से लिफ्ट बंद, 22 विभागों के कर्मचारी परेशान

बिलासपुर का यह तीन मंजिला संयुक्त भवन 22 सरकारी विभागों का केंद्र है, जहाँ रोज़ाना लगभग 500 लोग, जिनमें करीब 250 सरकारी कर्मचारी शामिल हैं, काम के लिए आते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, लिफ्ट पिछले छह महीने से खराब है और नई लिफ्ट का निर्माण कार्य अधूरा है। भवन में कुल 72 सीढ़ियाँ हैं, जिन्हें प्रतिदिन चढ़ना-उतरना कर्मचारियों के लिए अत्यंत कठिन हो गया है।


दिव्यांग कर्मचारियों के लिए पीड़ा का सबब बनी लापरवाही

सबसे दर्दनाक स्थिति उन चार दिव्यांग कर्मचारियों की है जो रोज़ाना सीढ़ियाँ चढ़ने को मजबूर हैं।
श्रम निरीक्षक संतोशी ध्रुव, जो बैसाखी के सहारे चलती हैं, हर दिन 24 सीढ़ियाँ चढ़कर पहले माले तक पहुँचती हैं
उनकी दिनचर्या ने अदालत का ध्यान खींचा और यह मामला सार्वजनिक चिंता का विषय बन गया।


🚱 भवन में पेयजल सुविधा भी नहीं, कर्मचारी खरीदते हैं पानी

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि भवन में किसी भी मंजिल पर पेयजल की सुविधा नहीं है। कर्मचारियों को खुद पैसे मिलाकर बाज़ार से पानी की बोतलें खरीदनी पड़ती हैं
यह भवन वर्ष 2013 में लगभग 8 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित हुआ था, फिर भी आज इसमें बुनियादी सुविधाओं का अभाव है।


📄 कलेक्टर को दी गई शिकायत, अब हाईकोर्ट की सख्ती से उम्मीदें

कर्मचारियों ने कई बार कलेक्टर को लिखित शिकायत भेजी थी, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
अब हाईकोर्ट के आदेश के बाद उम्मीद है कि लिफ्ट की मरम्मत और नई लिफ्ट का संचालन जल्द शुरू होगा।


🧑‍⚖️ एडवोकेट जनरल ने माना – दिव्यांगों और गर्भवती महिलाओं के लिए गंभीर समस्या

राज्य के एडवोकेट जनरल प्रफुल एन. भारत ने अदालत को बताया कि यह मामला न केवल दिव्यांगों बल्कि गर्भवती महिला कर्मचारियों और आम जनता की पहुंच से भी जुड़ा हुआ है।
उन्होंने कहा कि इस पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जा रही है और जल्द सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे।


🕊️ न्यायालय का निर्देश: “हर सरकारी भवन में सुगम पहुंच और बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित हों”

अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया कि सभी सार्वजनिक भवनों में लिफ्ट, रैंप और व्हीलचेयर की व्यवस्था अनिवार्य रूप से होनी चाहिए।
इसके अलावा, जहां सुविधाएं अस्थायी रूप से बंद हों, वहाँ दिव्यांग कर्मचारियों के लिए ग्राउंड फ्लोर पर वैकल्पिक व्यवस्था की जाए।


🔍 निष्कर्ष: प्रशासनिक संवेदनहीनता पर न्यायालय की सख्ती

हाईकोर्ट की यह कार्रवाई न केवल दिव्यांग अधिकारों की रक्षा की दिशा में मजबूत कदम है, बल्कि सरकारी विभागों के लिए चेतावनी भी है कि जनसुविधाओं की उपेक्षा अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी
लोगों को उम्मीद है कि इस मामले के बाद छत्तीसगढ़ के अन्य सरकारी भवनों में भी सुगम पहुंच और मूलभूत सुविधाओं पर ध्यान दिया जाएगा।