Non payment of statutory bonus:
अगर आपकी कंपनी ने इस दिवाली बोनस नहीं दिया है, तो यह सिर्फ निराशाजनक नहीं बल्कि कानूनी उल्लंघन भी हो सकता है। भारत में Non payment of statutory bonus यानी वैधानिक बोनस का भुगतान न करना Payment of Bonus Act, 1965 का गंभीर उल्लंघन माना जाता है।
यह कानून उन सभी कंपनियों और कारखानों पर लागू होता है जिनमें 20 या उससे अधिक कर्मचारी काम करते हैं। कानून के अनुसार, हर पात्र कर्मचारी को सालाना बोनस देना कंपनी की कानूनी जिम्मेदारी है — चाहे कंपनी को लाभ हुआ हो या नहीं।
📜 क्या है Statutory Bonus?
“दिवाली बोनस” जिसे आम लोग त्योहारों पर मिलने वाले इनाम के रूप में देखते हैं, दरअसल यह वही वैधानिक बोनस होता है जो हर वित्तीय वर्ष के अंत में दिया जाना चाहिए। इसे त्योहारों के समय देना केवल एक परंपरा बन गई है।
कानून के अनुसार, कंपनी को वित्तीय वर्ष समाप्त होने के 8 महीने के भीतर बोनस देना जरूरी है। इसीलिए कई संस्थान इसे दिवाली के समय भुगतान करते हैं।

⚖️ अगर कंपनी बोनस नहीं देती तो क्या होगा?
अगर कोई कंपनी पात्र कर्मचारियों को वैधानिक बोनस नहीं देती, तो कर्मचारी के पास कई कानूनी विकल्प होते हैं:
- श्रम आयुक्त के पास शिकायत:
कर्मचारी Labour Commissioner के पास औपचारिक शिकायत दर्ज कर सकता है। यह प्रक्रिया अपेक्षाकृत तेज़ और कम खर्चीली होती है। - रिकवरी सूट दाखिल करना:
कर्मचारी Labour Court में जाकर बोनस की राशि की वसूली के लिए मुकदमा दर्ज कर सकता है। - लीगल नोटिस भेजना:
वकील के माध्यम से कंपनी को कानूनी नोटिस भेजा जा सकता है, जिससे प्रबंधन पर दबाव बनता है। - औद्योगिक विवाद उठाना:
यदि कर्मचारी “वर्कमैन” की श्रेणी में आता है, तो वह Industrial Disputes Act, 1947 के तहत विवाद दर्ज कर सकता है।
🚨 कंपनी के लिए सज़ा और जुर्माने के प्रावधान
कानून के तहत कंपनी पर निम्न दंड लगाए जा सकते हैं:
- कैद: अधिनियम के उल्लंघन पर 6 महीने तक की जेल हो सकती है।
- जुर्माना: कंपनी या संबंधित अधिकारियों पर ₹1,000 तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
- व्यक्तिगत जिम्मेदारी: कंपनी के डायरेक्टर, मैनेजर या जिम्मेदार अधिकारी को भी व्यक्तिगत रूप से दंडित किया जा सकता है, अगर अपराध उनकी जानकारी में हुआ हो।
👩💼 कौन कर्मचारी पात्र है बोनस पाने के लिए?
कर्मचारियों को बोनस पाने के लिए कुछ शर्तें पूरी करनी होती हैं:
- वेतन सीमा: कर्मचारी का मूल वेतन और महंगाई भत्ता मिलाकर ₹21,000 प्रति माह से कम होना चाहिए।
- कार्य अवधि: कर्मचारी ने कम से कम 30 दिन उस वित्तीय वर्ष में कार्य किया हो।
- अनुपातिक भुगतान: यदि कोई कर्मचारी बीच वर्ष में इस्तीफा देता है, तो भी उसे अनुपातिक बोनस मिलना चाहिए।
💡 महत्वपूर्ण बातें:
- Statutory Bonus देना कानूनन अनिवार्य है, जबकि Customary Bonus कंपनी की इच्छा पर निर्भर करता है।
- बोनस रोका जा सकता है यदि कर्मचारी चोरी, धोखाधड़ी या हिंसक व्यवहार जैसे गंभीर अपराध में दोषी पाया जाए।
निष्कर्ष:
भारत में Non payment of statutory bonus न केवल श्रम कानून का उल्लंघन है, बल्कि इससे कंपनी की साख और कानूनी स्थिति पर भी बुरा असर पड़ सकता है। हर कंपनी को चाहिए कि वह समय पर अपने कर्मचारियों का बोनस दे — क्योंकि यह सिर्फ त्योहार की खुशियों का हिस्सा नहीं, बल्कि कर्मचारी का अधिकार है।
