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Pharma Freebies to Doctors पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम

Pharma Freebies to Doctors मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र सरकार को एक अहम निर्देश दिया है। कोर्ट ने दवा कंपनियों द्वारा डॉक्टरों को दवाएं लिखने के प्रोत्साहन के तौर पर कथित तौर पर दिए जाने वाले मुफ्त उपहार और अन्य लाभों के मुद्दे की जांच के लिए एक समिति गठित करने को कहा है।

यह मामला Federation of Medical and Sales Representatives Associations of India v. Union of India, W.P.(C) No. 323/2021 से संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में भी इस मामले का 8 अक्टूबर 2026 का आदेश दर्ज है।

दो सदस्यीय पीठ में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता शामिल थे। कोर्ट ने कहा कि समिति संबंधित पक्षों के सुझाव और अभ्यावेदन पर विचार करके केंद्र सरकार को अपनी सिफारिशें देगी।

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Pharma Freebies to Doctors पर केंद्र बनाएगा समिति

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को समिति गठित करने का निर्देश देते हुए मामले को अनुपालन संबंधी हलफनामे पर विचार के लिए 29 जनवरी को सूचीबद्ध किया है।

यानी कोर्ट ने फिलहाल सीधे कोई व्यापक नई वैधानिक व्यवस्था लागू करने के बजाय केंद्र सरकार को इस विषय पर संस्थागत स्तर पर अध्ययन और सिफारिश की प्रक्रिया आगे बढ़ाने को कहा है।

मामले की विस्तृत आदेश प्रति उपलब्ध होने के बाद समिति की संरचना और उसके अधिकार क्षेत्र से जुड़ी अतिरिक्त जानकारी स्पष्ट होगी।

Pharma Freebies to Doctors मामले में क्या है विवाद?

याचिका Federation of Medical and Sales Representatives Associations of India (FMRAI) की ओर से दायर की गई है। इसमें दवा कंपनियों द्वारा डॉक्टरों को कथित तौर पर उपहार, मनोरंजन, आतिथ्य और अन्य लाभ देकर अपनी दवाएं लिखने के लिए प्रभावित करने की प्रथा पर रोक लगाने की मांग की गई है।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि दवाओं की मार्केटिंग से जुड़ी ऐसी गतिविधियां मरीजों के स्वास्थ्य और दवा के तर्कसंगत इस्तेमाल को प्रभावित कर सकती हैं। याचिका में यह भी कहा गया है कि स्वास्थ्य का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है।

याचिकाकर्ता ने दवा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की जरूरत पर जोर दिया है।

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UCPMP को कानूनी दर्जा देने की मांग

इस मामले में Uniform Code of Pharmaceutical Marketing Practices (UCPMP) को वैधानिक आधार देने की मांग प्रमुख मुद्दों में शामिल है।

याचिका के अनुसार, केवल डॉक्टरों के लिए आचार संबंधी प्रतिबंध पर्याप्त नहीं हैं, यदि दवा कंपनियों द्वारा दिए जाने वाले कथित लाभों के लिए समान रूप से प्रभावी वैधानिक जवाबदेही नहीं हो।

याचिकाकर्ता ने निगरानी तंत्र, पारदर्शिता, जवाबदेही और उल्लंघन की स्थिति में स्पष्ट परिणाम तय करने की मांग की है।

मरीजों और दवा की कीमतों पर असर

याचिकाकर्ता की दलील के मुताबिक, यदि डॉक्टरों के प्रिस्क्रिप्शन को व्यावसायिक प्रोत्साहनों से प्रभावित किया जाता है, तो मरीजों को महंगी ब्रांडेड दवाएं लेने की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है।

इसका सीधा असर इलाज की लागत पर पड़ सकता है। याचिका में आशंका जताई गई है कि अनावश्यक या महंगी दवाओं के इस्तेमाल से मरीजों पर आर्थिक बोझ बढ़ सकता है।

हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये याचिकाकर्ता की ओर से लगाए गए आरोप और दलीलें हैं। समिति और सरकार की आगे की प्रक्रिया के बाद ही इस क्षेत्र में किसी नए वैधानिक तंत्र का स्वरूप स्पष्ट होगा।

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पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने जताई थी चिंता

दवा कंपनियों और डॉक्टरों के बीच वित्तीय या अन्य लाभों के संबंध का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट के सामने पहले भी आ चुका है। 2022 में Apex Laboratories मामले में कोर्ट ने डॉक्टरों को दिए जाने वाले मुफ्त उपहारों के संबंध में महत्वपूर्ण टिप्पणियां की थीं और ऐसी गतिविधियों को मरीजों के हित के लिए नुकसानदायक माना था।

इसी व्यापक विवाद में कोर्ट ने पहले भी UCPMP को अधिक प्रभावी और लागू करने योग्य बनाने की जरूरत पर सवाल उठाए थे। 2025 में सुनवाई के दौरान अदालत ने दवा कंपनियों द्वारा महंगी दवाओं को बढ़ावा देने से जुड़े मुद्दे पर भी चिंता जताई थी।

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आगे क्या होगा?

अब केंद्र सरकार को समिति गठित करनी होगी। समिति संबंधित हितधारकों के सुझावों और अभ्यावेदनों पर विचार करेगी और अपनी सिफारिशें केंद्र को देगी।

इसके बाद सरकार यह तय कर सकती है कि दवा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए मौजूदा व्यवस्था में बदलाव पर्याप्त है या किसी अधिक मजबूत वैधानिक तंत्र की जरूरत है।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले को 29 जनवरी को अनुपालन हलफनामे पर विचार के लिए सूचीबद्ध किया है।

Pharma Freebies to Doctors मामले में सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश दवा कंपनियों की मार्केटिंग व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की बहस को आगे बढ़ाता है। केंद्र द्वारा गठित होने वाली समिति अब हितधारकों के सुझावों की समीक्षा करेगी। खास तौर पर UCPMP को वैधानिक मजबूती देने और डॉक्टरों को प्रभावित करने वाले कथित प्रोत्साहनों पर प्रभावी नियंत्रण का सवाल आगे की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण रहेगा।

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