Constitution Amendment Bill को लेकर संसद की संयुक्त समिति (JPC) ने एक महत्वपूर्ण सिफारिश की है। समिति ने सुझाव दिया है कि यदि प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री या किसी राज्य के मुख्यमंत्री को किसी गंभीर आपराधिक मामले में लगातार 30 दिनों तक न्यायिक हिरासत में रखा जाता है, तो उन्हें स्थायी रूप से पद से हटाने के बजाय केवल निलंबित (Suspended) किया जाए। यह सिफारिश विपक्ष की आपत्तियों के बाद सामने आई है और यदि इसे स्वीकार किया जाता है तो विधेयक के मूल प्रावधान में बड़ा बदलाव होगा।
📲 WhatsApp पर 4thNation की हर बड़ी खबर सबसे पहले पाने के लिए Join करें:
https://whatsapp.com/channel/0029VaOjosfFHWq7ssCngl1j
Constitution Amendment Bill क्या है?
Constitution Amendment Bill का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि देश या राज्य की सरकारें जेल से संचालित न हों।
पिछले वर्ष अगस्त में पेश किए गए प्रस्तावित 130वें संविधान संशोधन विधेयक में यह प्रावधान रखा गया था कि यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री 30 दिनों तक जेल में रहने के बाद स्वयं इस्तीफा नहीं देते हैं, तो 31वें दिन उनका पद स्वतः समाप्त माना जाएगा।
हालांकि, इस प्रस्ताव पर विपक्षी दलों ने कड़ा विरोध दर्ज कराया था।
Constitution Amendment Bill पर संयुक्त समिति की नई सिफारिश
संयुक्त संसदीय समिति ने अब अपनी समीक्षा रिपोर्ट में बड़ा बदलाव सुझाया है।
समिति ने कहा है कि ‘Removal’ (पद से हटाना) शब्द की जगह ‘Suspension’ (निलंबन) शब्द का उपयोग किया जाए। यानी अंतिम न्यायिक निर्णय आने तक संबंधित प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री केवल निलंबित रहेंगे, स्थायी रूप से पद से नहीं हटाए जाएंगे।
समिति का मानना है कि यह व्यवस्था संवैधानिक पदों की गरिमा और न्यायिक प्रक्रिया दोनों के बीच संतुलन बनाएगी।
ऑटोमैटिक बहाली का भी प्रस्ताव
समिति ने ऑटोमैटिक रिवर्सल (Automatic Reversal) या सनसेट क्लॉज जोड़ने की भी सिफारिश की है।
इसके अनुसार यदि संबंधित व्यक्ति अदालत से बरी हो जाता है या निर्धारित समय सीमा के भीतर उसके खिलाफ अभियोजन आगे नहीं बढ़ता है, तो उसका निलंबन स्वतः समाप्त हो जाएगा और वह पुनः अपने पद पर लौट सकेगा।
समिति का कहना है कि निर्दोष साबित होने वाले व्यक्ति को स्थायी नुकसान से बचाने के लिए यह प्रावधान आवश्यक है।
किन मामलों में लागू होगा प्रावधान?
समिति ने यह भी स्पष्ट किया है कि गंभीर आपराधिक अपराध किन्हें माना जाएगा।
सिफारिश के अनुसार केवल वे अपराध इस दायरे में आएंगे जिनमें पांच वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है। इसके लिए विधेयक में एक अलग अनुसूची (Schedule) जोड़ने का सुझाव दिया गया है, जिससे स्पष्ट हो सके कि किन अपराधों पर निलंबन लागू होगा।
फास्ट-ट्रैक अदालतों में होगी सुनवाई
समिति ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला देते हुए सुझाव दिया है कि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों से जुड़े गंभीर आपराधिक मामलों की सुनवाई फास्ट-ट्रैक या विशेष अदालतों में की जाए।
इसका उद्देश्य ऐसे मामलों का शीघ्र निपटारा करना है ताकि लंबे समय तक संवैधानिक पदों पर अनिश्चितता की स्थिति न बनी रहे।
विपक्ष ने क्यों जताई थी आपत्ति?
जब मूल विधेयक पेश किया गया था, तब कई विपक्षी दलों ने इसे राजनीतिक दुरुपयोग की आशंका से जोड़ते हुए विरोध किया था।
विपक्ष का तर्क था कि झूठे या राजनीतिक रूप से प्रेरित मामलों में गिरफ्तारी कर निर्वाचित सरकारों को अस्थिर किया जा सकता है। इसी वजह से कई विपक्षी दलों ने संयुक्त समिति की कार्यवाही से दूरी भी बनाई थी।
समिति की नई सिफारिशों को विपक्ष की चिंताओं के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
आगे क्या होगी प्रक्रिया?
यदि संयुक्त समिति की सिफारिशों को स्वीकार किया जाता है, तो केंद्रीय गृह मंत्रालय संशोधित मसौदा तैयार करेगा।
इसके बाद प्रस्ताव को केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा और मंजूरी मिलने पर संशोधित Constitution Amendment Bill संसद में पेश किया जाएगा।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि फिलहाल यह केवल संयुक्त समिति की सिफारिश है, अभी यह कानून नहीं बना है।
Constitution Amendment Bill पर संयुक्त समिति की नई सिफारिश भारतीय लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। समिति ने पद से स्वतः हटाने के बजाय निलंबन, स्वतः बहाली और फास्ट-ट्रैक सुनवाई जैसे प्रावधान सुझाकर न्यायिक प्रक्रिया और संवैधानिक संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया है। अब अंतिम फैसला सरकार और संसद की आगे की विधायी प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
