Chhattisgarh High Court ने हाल ही में एक ऐतिहासिक और चर्चित फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई नाबालिग लड़की स्वेच्छा से किसी व्यक्ति के साथ जाती है, तो उस व्यक्ति पर अपहरण का मामला नहीं बनता। दीपक वैष्णव बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (Deepak Vaishnav vs. State of Chhattisgarh) मामले में यह महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया गया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला सितंबर 2022 का है, जब छत्तीसगढ़ के एक जिले में एक 15 वर्षीय नाबालिग लड़की स्कूल जाने के लिए घर से साइकिल लेकर निकली, लेकिन घर नहीं लौटी।
लड़की के पिता ने जब बेटी को घर न लौटते देखा तो उन्होंने पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस ने जांच शुरू की और बाद में लड़की को ढूंढ निकाला।
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लड़की की गवाही और यात्रा का विवरण
जांच में सामने आया कि लड़की स्कूल जाते समय रास्ते में 24 वर्षीय दीपक वैष्णव से मिली और उसके साथ बस में बैठकर मुंगेली चली गई।
मुंगेली से दोनों रायपुर आए और फिर वहां से हैदराबाद के लिए बस पकड़ी। हैदराबाद में कुछ समय रुकने के बाद दोनों विजयवाड़ा और फिर अग्रपल्ली पहुंचे।
अग्रपल्ली में आरोपी ने एक कमरा किराए पर लिया और दोनों करीब एक महीने तक वहां पति-पत्नी की तरह साथ रहे। इस पूरे समय लड़की ने न कोई शिकायत की, न घर वापस जाने की कोशिश की।
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ट्रायल कोर्ट का फैसला और हाईकोर्ट की चुनौती
पुलिस की जांच पूरी होने के बाद ट्रायल कोर्ट ने दीपक वैष्णव को अपहरण और POCSO Act के तहत दोषी करार देते हुए 20 साल की सजा सुनाई।
दीपक ने इस फैसले को Chhattisgarh High Court में चुनौती दी। उसके वकील ने तर्क दिया कि लड़की स्वेच्छा से उसके साथ गई थी और उसने खुद यह सुझाव दिया था कि दोनों साथ चलें।
राज्य सरकार का पक्ष
दूसरी ओर राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि घटना के समय लड़की नाबालिग थी, इसलिए उसकी सहमति कानूनी रूप से अर्थहीन है। सरकार का कहना था कि ट्रायल कोर्ट ने सही निर्णय दिया था।
Chhattisgarh High Court का अहम निर्णय
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने इस मामले की गहराई से सुनवाई की।
Chhattisgarh High Court ने साफ किया:
“रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह सिद्ध हो कि अपीलकर्ता ने किसी भी समय पीड़िता को घर छोड़ने के लिए बाध्य या प्रेरित किया हो। पीड़िता स्वेच्छा से अपीलकर्ता के साथ गई और बिना किसी विरोध या शिकायत के उसके साथ रही।”
कोर्ट ने कहा कि अपहरण के मामले में यह जरूरी है कि आरोपी ने पीड़िता को घर छोड़ने के लिए उकसाया या बहकाया हो। चूंकि यहां ऐसा कोई साक्ष्य नहीं था, इसलिए अपहरण का आरोप नहीं बनता।
POCSO Act के तहत आरोप पर Chhattisgarh High Court का रुख
मेडिकल और फॉरेंसिक रिपोर्ट
POCSO Act के तहत यौन उत्पीड़न के आरोप पर Chhattisgarh High Court ने पाया कि:
- लड़की ने माना कि दोनों पति-पत्नी की तरह रहे और शारीरिक संबंध बने।
- लेकिन मेडिकल जांच में कोई चोट नहीं पाई गई।
- फॉरेंसिक रिपोर्ट नेगेटिव आई और यौन संबंध के बारे में कोई निश्चित राय नहीं दी जा सकी।
संदेह का लाभ
इन सभी खामियों को देखते हुए कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष POCSO Act के तहत अपराध को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।
इसलिए आरोपी को POCSO Act के तहत भी दोषमुक्त कर दिया गया।
इस फैसले के कानूनी मायने
अपहरण कानून की व्याख्या
Chhattisgarh High Court का यह फैसला भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 361 के तहत अपहरण की परिभाषा को स्पष्ट करता है।
धारा 361 के अनुसार, अपहरण तभी माना जाएगा जब किसी को बहला-फुसलाकर या जबरदस्ती ले जाया गया हो। यदि नाबालिग स्वेच्छा से गई हो और आरोपी ने कोई प्रलोभन न दिया हो, तो अपहरण का आरोप नहीं बनता।
POCSO Act और साक्ष्य का महत्व
यह मामला यह भी दिखाता है कि POCSO के तहत दोषसिद्धि के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक हैं। केवल आरोप या बयान पर्याप्त नहीं हैं। मेडिकल और फॉरेंसिक साक्ष्य निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
संबंधित लिंक
🔗 Do Follow:
- POCSO Act की पूरी जानकारी – India Code (Government of India)
- Chhattisgarh High Court की आधिकारिक वेबसाइट
Chhattisgarh High Court का यह फैसला न केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि न्यायालय साक्ष्यों के आधार पर ही निर्णय लेता है, न कि मात्र भावनात्मक या सामाजिक दबाव में। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की पीठ ने यह सुनिश्चित किया कि बिना पर्याप्त साक्ष्य के किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जाए।
यह निर्णय छत्तीसगढ़ समेत पूरे देश के न्यायिक तंत्र के लिए एक मार्गदर्शक फैसला बन सकता है, खासकर उन मामलों में जहां नाबालिगों के स्वैच्छिक आचरण और अपहरण की परिभाषा के बीच की महीन रेखा को समझना जरूरी हो।
